उज्जैन दर्शन

उज्जैन की भौगोलिक स्थिति अनूठी

सूर्य के ठीक नीचे की स्थिति उज्जयिनी के अलावा सॅसार में किसी नगर की नहीं
 
प्राचीन भारत की समय-गणना का केन्द्र-बिन्दु होने के कारण ही काल के आराध्य महाकाल हैं, जो भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं। हिन्दुस्तान की ह्रदय-स्थली उज्जयिनी की भौगोलिक स्थिति अनूठी है। खगोल-शास्त्रियों की मान्यता है कि उज्जैन नगर पृथ्वी और आकाश के मध्य में स्थित है। भूतभावन महाकाल को कालजयी मानकर ही उन्हें काल का देवता माना जाता है। काल-गणना के लिये मध्यवर्ती स्थान होने के कारण इस नगरी का प्राकृतिक, वैज्ञानिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी बढ़ जाता है। इन सब कारणों से ही यह नगरी सदैव काल-गणना और काल-गणना शास्त्र के लिये उपयोगी रही है। इसलिये इसे भारत का ग्रीनविच माना जाता है। 

यह प्राचीन ग्रीनविच उज्जैन देश के मानचित्र में 23.9 अंश उत्तर अक्षांश एवं 74.75 अंश पूर्व रेखांश पर समुद्र सतह से लगभग 1658 फीट ऊँचाई पर बसी है। इसलिये इसे काल-गणना का केन्द्र-बिन्दु कहा जाता है। यही कारण है कि प्राचीन-काल से यह नगरी ज्योतिष-शास्त्र का प्रमुख केन्द्र रही है। इसके प्रमाण में राजा जय सिंह द्वारा स्थापित वेधशाला आज भी इस नगरी को काल-गणना के क्षेत्र में अग्रणी सिद्ध करती है। भौगोलिक गणना के अनुसार प्राचीन आचार्यों ने उज्जैन को शून्य रेखांश पर माना है। कर्क रेखा भी यहीं से जाती है। इस प्रकार कर्क रेखा और भूमध्य रेखा एक-दूसरे को उज्जैन में काटती है। यह भी माना जाता है कि संभवत: धार्मिक दृष्टि से श्री महाकालेश्वर का स्थान ही भूमध्य रेखा और कर्क रेखा के मिलन स्थल पर हो, वहीं नाभि-स्थल होने से पृथ्वी के मध्य में स्थित है। इन्हीं विशिष्ट भौगोलिक स्थितियों के कारण काल-गणना, पंचांग का निर्माण और साधना की सिद्धि के लिये उज्जैन नगर को महत्वपूर्ण माना गया है। प्राचीन भारतीय मान्यता के अनुसार जब उत्तर ध्रुव की स्थिति पर 21 मार्च से प्राय: 6 मास का दिन होने लगता है, तब 6 मास के 3 माह व्यतीत होने पर सूर्य दक्षिण क्षितिज से बहुत दूर हो जाता है। इस समय सूर्य ठीक उज्जैन के मस्तक पर रहता है। उज्जैन का अक्षांश एवं सूर्य की परम क्रांति दोनों ही 24 अक्षांश पर मानी गयी है। इसलिये सूर्य के ठीक नीचे की स्थिति उज्जयिनी के अलावा विश्व के किसी नगर की नहीं है।

वराह पुराण में उज्जैन नगरी को शरीर का नाभि देश (मणिपूर चक्र) और महाकालेश्वर को इसका अधिष्ठाता कहा गया है। महाकाल की यह कालजयी नगरी विश्व की नाभि-स्थली है। जिस प्रकार माँ की कोख में नाभि से जुड़ा बच्चा जीवन के तत्वों का पोषण करता है, इसी प्रकार काल, ज्योतिष, धर्म और आध्यात्म के मूल्यों का पोषण भी इसी नाभि-स्थली से होता रहा है। उज्जयिनी भारत के प्राचीनतम शिक्षा का केन्द्र रहा है। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा, उनका संवर्धन एवं उसको अक्षुण्ण बनाये रखने का कार्य यहीं पर हुआ है। सत-युग, त्रेता-युग, द्वापर-युग और कल-युग में इस नगरी का महत्व प्राचीन शास्त्रों में बतलाया गया है।

उज्जयिनी से काल की सही गणना और ज्ञान प्राप्त किया जाता रहा है। इस नगरी में महाकाल की स्थापना का रहस्य यही है तथा काल-गणना का यही मध्य-बिन्दु है। मंगल गृह की उत्पत्ति का स्थान भी उज्जयिनी को माना गया है। यहाँ पर ऐतिहासिक नव-ग्रह मंदिर और वेधशाला की स्थापना से काल-गणना का मध्य-बिन्दु होने के प्रमाण मिलते हैं। इस संदर्भ में यदि उज्जयिनी में लगातार अनुसंधान, प्रयोग और सर्वेक्षण किये जायें, तो ब्रह्माण्ड के अनेक अनछुए पक्षों को भी जाना जा सकता है।

 

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नागचंद्रेश्वर मंदिर

हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। हिंदू परंपरा में नागों को भगवान का आभूषण भी माना गया है। भारत में नागों के अनेक मंदिर हैं, इन्हीं में से एक मंदिर है उज्जैन स्थित नागचंद्रेश्वर का,जो की उज्जैन के प्रसिद्ध महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्तिथ है। इसकी खास बात यह है कि यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही दर्शनों के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में मौजूद रहते हैं।

 

नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है , इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है। माना जाता है कि पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और माँ पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं।

 

पौराणिक मान्यता सर्पराज तक्षक ने शिवशंकर को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। तपस्या से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया। मान्यता है कि उसके बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सा‍‍‍न्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया |

 

 

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सिद्धवट

सिद्धवट स्कंदपुराण में इसे प्रेतशिला – तीर्थ कहा गया है |

उज्जैन के भैरवगढ़ के पूर्व में शिप्रा के तट पर प्रचीन सिद्धवट का स्थान है। इसे शक्तिभेद तीर्थ के नाम से जाना जाता है। हिंदू पुराणों में इस स्थान की महिमा का वर्णन किया गया है। हिंदू मान्यता अनुसार चार वट वृक्षों का महत्व अधिक है। अक्षयवट, वंशीवट, बौधवट और सिद्धवट के बारे में कहा जाता है कि इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता।

 

सिद्धवट के पुजारी ने कहा कि स्कंद पुराण अनुसार पार्वती माता द्वारा लगाए गए इस वट की शिव के रूप में पूजा होती है। पार्वती के पुत्र कार्तिक स्वामी को यहीं पर सेनापति नियुक्त किया गया था। यहीं उन्होंने तारकासुर का वध किया था। संसार में केवल चार ही पवित्र वट वृक्ष हैं। प्रयाग (इलाहाबाद) में अक्षयवट, मथुरा-वृंदावन में वंशीवट, गया में गयावट जिसे बौधवट भी कहा जाता है और यहाँ उज्जैन में पवित्र सिद्धवट हैं।

 

यहाँ तीन तरह की सिद्धि होती है संतति, संपत्ति और सद्‍गति। तीनों की प्राप्ति के लिए यहाँ पूजन किया जाता है। सद्‍गति अर्थात पितरों के लिए अनुष्ठान किया जाता है। संपत्ति अर्थात लक्ष्मी कार्य के लिए वृक्ष पर रक्षा सूत्र बाँधा जाता है और संतति अर्थात पुत्र की प्राप्ति के लिए उल्टा सातिया (स्वस्विक) बनाया जाता है। यह वृक्ष तीनों प्रकार की सिद्धि देता है इसीलिए इसे सिद्धवट कहा जाता है।

 

यहाँ पर नागबलि, नारायण बलि-विधान का विशेष महत्व है। संपत्ति, संतित और सद्‍गति की सिद्धि के कार्य होते हैं। यहाँ पर कालसर्प शांति का विशेष महत्व है, इसीलिए कालसर्प दोष की भी पूजा होती है।वर्तमान में इस सिद्धवट को कर्मकांड, मोक्षकर्म, पिंडदान, कालसर्प दोष पूजा एवं अंत्येष्टि के लिए प्रमुख स्थान माना जाता है।

 

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मंगल नाथ मंदिर

दिव्य शिप्रा के तट पर मंगल नाथ मंदिर मत्स्य पुराण के अनुसार मंगलनाथ परिसर को मंगल का जन्म स्थान माना गया है | मंगलनाथ भगवान शिव के ही रूप है । मंगलनाथ मंदिर कर्क रेखा पर स्थित है और इसे भारत वर्ष का नाभि स्थल भी कहा जाता है |यह परिसर अपने दैवीय गुणों के कारण अत्यंत प्रसिद्ध है |मंगल (Mars), नौ ग्रहों में से एक ग्रह है. मंगल (Mars) अंगारक तथा कुज के नाम से भी जाना जाता है. वैदिक एवं पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान मंगल की माता पृथ्वी देवी है | वह शक्ति, वीरता और साहस के साथ जुड़ा हुआ है |

 

मंगल ग्रह शक्ति, वीरता और साहस का परिचायक है तथा स्वामी मंगल के जीवन का उद्देश्य धर्म की सुरक्षा है | भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्वामी मंगल के चार हाथ है, और हथियार के रूप में त्रिशूल और गदा वहन करते है. वह लाल गहने पहनते है | भगवान मंगल की पूजा से त्वचा की बीमारियों, कर्ज और गरीबी से मुक्ति मिलती है | स्वामी मंगल का रत्न मूंगा है जो लाल होता है, और उसका दिन मंगलवार है तथा वह दक्षिण दिशा के संरक्षक है |

 

मंगल नाथ मंदिर में श्रद्धालु मंगलदोष तथा कालसर्प दोष का निवारण करने आते है ।मंगल नाथ मंदिर में भगवान मंगलनाथ का प्रत्येक मंगलवार को भातपूजन किया जाता है। मंगलनाथ मंदिर पर कालसर्प दोष शांति, केतु शांति, मंगल गृह शांति, नव गृह जाप , भात पूजा , महा मृत्युंजय जाप, रुद्राभिषेक, नव गृह शांति , शनि गृह जाप , शनि गृह शांति , राहु शांति आदि करने का विधान है ।

 

 

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'महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग'

देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में 'महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग' में 'महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग' का अपना एक अलग महत्व है।भारत के नाभिस्थल में कर्क रेखा पर स्थित महाकाल का वर्णन रामायण , महाभारत ,पुराण तथा अनेक धार्मिक ग्रंथो में मिलता है ।                                                                                                                                                                       महाकाल मंदिर दक्षिण मुखी होने से भी इस मंदिर का अधिक महत्व है महाकाल मंदिर विश्व का एक मात्र ऐसा शिव मंदिर है जहाँ दक्षिणमुखी शिवलिंग प्रतिष्ठापित है ।इस कारण तांत्रिको के लिए यह महत्व पूर्ण शिव लिंग है । यह स्वयंभू शिवलिंग है । जो बहुत जाग्रत है । इसी कारण केवल यहाँ तड़के ४ बजे भस्म आरती करने का विधान है । यह प्रचलित मान्यता थी कि श्मशान मे कि ताजी चिता की भस्म से भस्म आरती की जाती थी । पर वर्तमान में गाय के गोबर से बने गए कंडो की भस्म से भस्म आरती की जाती है । एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भस्म आरती केवल पुरुष ही देखते है । जिन पुरुषो ने बिना सीला हुआ सोला पहना हो वही भस्म आरती में शामिल हो सकते है ।

 

कहा जाता है कि जो महाकाल का भक्त है उसका काल भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। महाकाल के बारे में तो यह भी कहा जाता है कि यह पृथ्वी का एक मात्र मान्य शिवलिंग है। महाकाल की महिमा का वर्णन इस प्रकार से भी किया गया है -

 

आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम् ।

भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते ॥

 

इसका तात्पर्य यह है कि आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है। इस लिये महाकालेश्वर को प्रथ्वी लोक का अधिपति कहा गया है ।

 

आज जो महाकालेश्वर का विश्व-प्रसिद्ध मन्दिर विद्यमान है, यह राणोजी शिन्दे शासन की देन है। यह तीन खण्डों में विभक्त है। निचले खण्ड में महाकालेश्वर बीच के खण्ड में ओंकारेश्वर तथा सर्वोच्च खण्ड में नागचन्द्रेश्वर के शिवलिंग प्रतिष्ठ हैं। शिखर के तीसरे तल पर भगवान शंकर-पार्वती नाग के आसन और उनके फनों की छाया में बैठी हुई सुन्दर और दुर्लभ प्रतिमा है। इसके दर्शन वर्ष में एक बार श्रावण शुक्ल पंचमी ;नागपंचमीद्ध के दिन होते हैं,यहीं एक शिवलिंग भी है।

 

कुण्ड के पूर्व में जो विशाल बरामदा है, वहाँ से महाकालेश्वर के गर्भगृह में प्रवेश किया जाता है। इसी बरामदे के उत्तरी छोर पर भगवान् राम एवं देवी अवन्तिका की आकर्षक प्रतिमाएँ पूज्य हैं। मन्दिर परिसर में दक्षिण की ओर अनेक छोटे-मोटे शिव मन्दिर हैं जो शिन्दे काल की देन हैं। इन मन्दिरों में वृद्ध महाकालेश्वर अनादिकल्पेश्वर एवं सप्तर्षि मन्दिर प्रमुखता रखते हैं। ये मन्दिर भी बड़े भव्य एवं आकर्षक हैं। महाकालेश्वर का लिंग पर्याप्त विशाल है। ।

 

कलात्मक एवं नागवेष्टित रजत जलाधारी एवं गर्भगृह की छत का यंत्रयुक्त तांत्रिक रजत आवरण अत्यंत आकर्षक है। गर्भगृह में ज्योतिर्लिंग के अतिरिक्त गणेश, कार्तिकेय एवं पार्वती की आकर्षक प्रतिमाएँ प्रतिष्ठ हैं। दीवारों पर चारों ओर शिव की मनोहारी स्तुतियाँ अंकित हैं। नंदादीप सदैव प्रज्ज्वलित रहता है। ।

 

यहीं उत्तर में राम मंदिर और अवन्तिकादेवी की प्रतिमा है। दक्षिण में गर्भग्रह जाने वाले द्वार के निकट गणपति और वीरभद्र की प्रतिमा है। अन्दर गुफा में ;गर्भ ग्रह मद्ध स्वयंभू ज्योतिर्लिंग, महाकालेश्वर, शिवपंचायतन ;गणपति, देवी और स्कंदद्ध सहित विराजमान हैं। गर्भग्रह के समाने दक्षिण के विशाल कक्ष में नन्दीगण विराजमान हैं। शिखर के प्रथम तल पर ओंकारेश्वर स्थित है।

 

उज्जयिनी में स्कन्द पुराणान्तर्गत अवन्तिखंड में वर्णित ८४ लिंगों में से ४ शिवालय इसी प्रांगण में है। ८४ में ५वें अनादि कल्पेश्वर, ७वें त्रिविष्टपेश्वर, ७२वें चन्द्रादित्येश्वर और ८०वें स्वप्नेश्वर के मंदिर में हैं। दक्षिण-पश्चिम प्रांगण में वृद्धकालेश्वर ;जूना महाकालद्ध का विशाल मंदिर है। यहीं सप्तऋषियों के मंदिर, शिवलिंग रूप में है। नीलकंठेश्वर और गौमतेश्वर के मंदिर भी यहीं है।

 

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कालियादेह महल

यह पौरणिक सूर्य मंदिर हे  कालियादेह महल उज्जैन के मंदिर के शहर के सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों में से एक है। यह महल बहुत समय पहले वर्ष 1458 ई. में मांडू के सुल्तान द्वारा बनवाया गया था।यहाँ शिप्रा से नाहर निकाल  कर सेतु, कुंड, नीर्झर, छत्रियो ,विशाल इस्नानगार आदि का भी निर्माण किया गया है |वर्षा काल में ५२  कुंडोका सोंदर्य देखने लायक बनता है |  यह महल शिप्रा नदी के बीच एक द्वीप पर स्थित है। पिंडारियों के समय यह महल पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया था और 1920 में श्री माधव राव सिंधिया ने इसे फिर से बहाल किया था।

 

इस महल की वास्तुकला बहुत महत्वपूर्ण है तथा इसका केंद्रीय हाल एवं गुंबद    पारसी वास्तुकला का उमदा उदाहरण है। इस महल में अकबर और जहाँगीर की यात्रा पर दो शिलालेख विरासत के रूप में स्थित है। मध्य प्रदेश के पर्यटन मंत्रालय के अनुसार यह महल सबसे अधिक देखें जाने वाले स्थानों में से एक हैं। सारे परिदृश्य को गौरवशाली बनाते हुए इस महल के दोनों ओर शिप्रा नदी बहती है।

 

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दुर्गादास की छतरी

वास्तुकला ओर पत्थरों पर नक्काशी युक्त एतिहासिक विरासत 

दुर्गादास की छतरी उज्जैन के मंदिरों के शहर में स्थित एक विशिष्ट स्मारक है। यह स्मारक छतरी के रूप में वीर दुर्गादास की याद में बनवाया गया था वे जोधपुर के  राजा जसवंत सिंह के सेनापति थे ओर राजकुमार अजीतसिंह के संरक्षक थे|उन्होने ओरंगजेब से वीरतापूर्वक लड़ाई की| वे कि राजपूताना इतिहास में एक महान शख्सियत है।

 

वीर दुर्गादास ने महाराज जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद मुग़लों से लड़ाई की और औरंगज़ेब की इच्छा के विरुद्ध जोधपुर पर चढ़ाई करने में अजीत सिंह की सहायता की। वीर दुर्गादास की 1718 में मृत्यु हो गई और इसकी इच्छा थी कि इसका दाह संस्कार शिप्रा नदी के किनारे किया जाए।

 

इस स्मारक की वास्तुकला राजपूत शैली में है तथा एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। यह छतरी वीर दुर्गादास की मृत्यु के बाद जोधपुर के शासकों द्वारा उसकी याद में बनवायी गई थी।बहुत से लोगों का यह मानना है कि यह स्मारक छोटे से रत्न की तरह चमकता है चूंकि आसपास का परिदृश्य प्रकृति से भरपूर है।

 

 

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चौबीस खंबा माता

श्री महाकालेश्वर मंदिर के निकट यह परमार कालीन प्रवेश द्वार १२ निचे १२ ऊपर स्तंभ से निर्मित   नगर के मध्य विराजित महाकाल वन के मुख्य प्रवेश द्वार पर विराजित माता महामाया व माता महालया चौबीस खंबा माता के नाम से प्रसिद्ध है । प्रवेश द्वार में चौबीस खम्बे होने के कारण नाम चौबीसखंबा पड़ा । तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध उज्जयिनी के चारों द्वार पर भैरव तथा देवी विराजित है , जो आपदा-विपदा से नगर की रक्षा करते है चौबीसखंबा माता उनमे से एक है ।मंदिर की सायं कालीन आरती विशेश रुप से दर्शनीय है |  शारदीय नवरात्री की महाष्टमी पर कलेक्टर दोनों देवियों को मदिरा पिलाकर शासकीय पूजा करते है ।तथा शहर के प्राचीन देवी मंदिरों तक अनवरत मदिरा की धारछोड़ी जाती यह धार लगभग १२ घंटे तक चलती है | इसके बाद नगर के अन्य देवी व भैरव मंदिर में पूजा होती है ।

 

चौबीसखंबा माता मंदिर पुरात्तव विभाग के अधीन संरक्षित स्मारक है । यह मंदिर करीब १००० साल पुराना होकर परमारकालीन स्थापत्य कला तथा द्वार परंपरा का उत्कृष्ट उदारहण है । कभी यह महाकाल वन का मुख्य प्रवेश द्वार रहा है । अब कालांतर में यह नगर के मध्य विराजित है। 

 

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चिंतामन गणेश

चिंतामन गणेश मंदिर उज्जैन के तीर्थ स्थलों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है । उज्जैन से करीब 6 किलोमीटर दूर हे |

चिंतामन गणेश मंदिर में भगवान श्री गणेश के तीन रूप एक साथ विराजमान है, जो चितांमण गणेश, इच्छामण गणेश और सिद्धिविनायक के रूप में जाने जाते है। श्री चिंताहरण गणेश जी की ऐसी अद्भूत और अलोकिक प्रतिमा देश में शायद ही कहीं होगी। चिंतामणी गणेश चिंताओं को  दूर करते हैं, इच्छामणी गणेश इच्छाओं को पूर्ण करते हैं और सिद्धिविनायक रिद्धि-सिद्धि देते हैं। इसी वजह से दूर-दूर से भक्त यहां खिंचे चले आते हैं।

 

स्वयं-भू स्थली के नाम से विख्यात चिंतामण गणपति की स्थापना के बारे में कई कहानियां प्रचलित है। ऐसा माना जाता है कि राजा दशरथ के उज्जैन में पिण्डदान के दौरान भगवान श्री रामचन्द्र जी ने यहां आकर पूजा अर्चना की थी। सतयुग में राम, लक्ष्मण और सीता मां वनवास पर थे तब वे घूमते-घूमते यहां पर आये तब सीता मां को बहुत प्यास लगी । लक्ष्मण जी ने अपने तीर इस स्थान पर मारा जिससे पृथ्वी में से पानी निकला और यहां एक बावडी बन गई। माता सीता ने इसी जल से अपना उपवास खोला था। तभी भगवान राम ने चिंतामण, लक्ष्मण ने इच्छामण एवं सिद्धिविनायक की पूजा अर्चना की थी।

 

मंदिर के सामने ही आज भी वह बावडी मोजूद है। जहां पर दर्शनार्थी दर्शन करते है। इस मंदिर का वर्तमान स्वरूप महारानी अहिल्याबाई द्वारा करीब 250 वर्ष पूर्व बनाया गया था। इससे भी पूर्व परमार काल में भी इस मंदिर का जिर्णोद्धार हो चुका है। यह मंदिर जिन खंबों पर टिका हुआ है वह परमार कालीन हैं।

 

देश के कोने-कोने से भक्त यहां दर्शन करने आते है।

 

उज्जैन के मालवा क्षेत्र में सैंकडो वर्षों से परम्परा चली आ रही कि जो भी कोई शादी करता है तो उसके परिजन लग्न यहां लिखवाने आते है और शादी के बाद पति-पत्नी दोनों ही यहां आकर दर्शन करते है और वो लग्न यहां चिंतामण जी के चरणों में छोड़कर जाते है। दोनों पति-पत्नी चिंतामण गणेश जी प्रार्थना करते है कि हमारी सारी चिंताओं को दूर कर हमे सुखी जीवन प्रदान करना।

किसी भी धार्मिक आयोजन, शुभकार्य, विवाह इत्यादि का प्रथम निमंत्रण भगवान चिंतामन गणेश को ही दिया जाता है ।



चैत्रमास की जत्रा 

प्रथम पूज्य गणेश भगवान केा धन्यवाद देने के लिए इस पावन पर्व का आयोजन किया जाता है। जत्रा की शुरुआत चैत्र मास के बुधवार से हेाती हैं । जो इस महीने के प्रति बुधवार को मनाया जाता है । आसपास के ग्रामीण इलाकों के किसान मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। अब जत्रा की इस परंपरा में अब किसानेां के साथ साथ आम लोग भी इसमें शामिल हेा गए हैं।

 

जत्रा के समय चिंतामण के अलावा अन्य गणेश मंदिरों में जत्रा की धूम रहती है। गजानन भगवान का इस दिन विशेष श्रृंगार किया जाता है। मंदिर का प्रांगण की सजावट बहुत ही आकर्षित हेाती है । दुकाने सजी हुई व लोगों का जत्रा केा लेकर बहुत उत्साहित नजर आते हैं । चारों ओर लोगों की चहल पहल दिखाई पड़ती है।

 

इस उत्सव के दौरान भगवान केा विशेष भोग भी लगाया जाता है। लोग मंदिरों में अपनी मान्याता पूरी हेाने पर क्विटलों से भोग लगाते हैं। इसमें लोंगो द्वारा दान पुण्य भी किया जाता है। चैत्र माह के आखिरी बुधवार को इसका समापन हेा जाता है।

 

उज्जैन दर्शन

संदीपनी आश्रम

भगवान श्रीकृष्ण ,बलराम ,सुदामा की विद्या स्थली

संदीपनी आश्रम उज्जैन के मंदिर शहर से दो किलोमीटर दूर स्थित प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। इस जगह का पौराणिक महत्व है। गुरु संदीपनी इस आश्रम का उपयोग श्रीकृष्ण, उनके मित्र सुदामा और भाई बलराम को पढ़ाने के लिए करते थे। इस जगह का उल्लेख महाभारत में किया गया है।

 

अब इस आश्रम को एक मंदिर में परिवर्तित कर दिया गया हे जो गुरु संदीपनी को समर्पित है। इस आश्रम के पास एक पत्थर पर 1 से 100 तक गिनती लिखी है ओर ऐसा माना जाता है कि यह गिनती गुरु संदीपनी द्वारा लिखी गई थी। इस आश्रम में भगवान श्री कृष्ण , सुदामा तथा बलराम ने गुरुकुल परंपरा के अनुसार विद्या अध्ययन कर १४ विद्या ६४ कलाएँ सीखी थी । संदीपनी आश्रम के पास गोमती कुंड स्थित है जो कि एक छोटी पानी की टंकी है।

 

ऐसा माना जाता है कि श्रीकृष्ण ने पवित्र केंद्रों के सारे पानी को गोमती कुंड की ओर मोड़ दिया था ताकि गुरु संदीपनी को आसानी से पवित्र जल मिलता रहे। गुरु संदीपनी के समय में इस आश्रम में युद्ध कलाएँ भी सिखाई जाती थी तथा दिन के अंत में आध्यात्मिक संरेखण ही मुख्य उद्येश्य था।

 

 

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राम जनार्दन

अंकपात क्षेत्र में स्थित यह मंदिर अपने स्थापत्य , शांत वातावरण के साथ सुंदरता के लिए भी जाना जाता है । मूल रूप से यह सप्त सागरों स्थान रखने वाले अतिप्राचीन विष्णु सागर के तट पर स्थित एक परकोटे पर निर्मित है । जिसमे एक राम मंदिर व दूसरा जनार्दन (कृष्ण ) मंदिर है ।यहाँ पर परमार कालीन गिरिधर कृष्ण ,शेषशायी ब्रह्मा , विष्णु तथा महेश की सुन्दर प्रतिमाऐं भी है|राम मंदिर में राम लक्ष्मण और सीता की अति प्रचीन प्रतिमाएं तथा जनार्दन –विष्णु की भी प्रतिमाए उसी दौर की है| जो कि सत्रहवी शताब्दी की है| कला की द्रष्टि से दोनों ही मंदिर भव्य बने हुवे है|मराठाकालीन चित्रों के सुंदर उदाहरण दोनों ही मंदिर की दीवारों अंकित है| राम एवं कृष्ण की लीलाओं के मनोहारी द्रश्यों के अलावा बोदल्या बुआ महाराज एवं संत  तुकोबा आदि के चित्र भी बहुत प्रभावशाली है| दोनों मंदिरों में तथा जनार्दन मन्दिर के सामने कुण्ड के पास कुछ पुरातन प्रतिमाएं प्रतिष्टित है| जो शिल्क के द्रष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है| कुण्ड के निकट गोवर्धन कृष्ण की प्रतिमा ग्यारहवी शताब्दी की है| राम मंदिर के सभा –मण्डप तथा गर्भगृह के बीच शेषशायी विष्णु की प्रतिमा दसवी शताब्दी की तथा ब्रह्मा, विष्णु और महेस की प्रतिमाएं बारहवी शताब्दी की है| 

 

विशेष रूप से श्रीकृष्णा जन्माष्टमी और रामनवमी पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते है । इस मंदिर का निर्माण राजा जयसिह ने करवाया था । कालांतर में मराठाकाल में परकोटा और कुंड निर्मित किये गए । यहाँ कई देवी देवताओ के चित्र और करीब १८०५ ईस्वी का शिलालेख अभी अंकित है ।

 

 

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कालभैरव

अष्ट भेरव में काल भैरव प्रमुख है

उज्जैन शहर से आठ किलोमीटर दूर भैरवगढ़ क्षेत्र में स्थापित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है, इस मंदिर में शिव अपने भैरव स्वरूप में विराजते हैं.| काल भैरव के इस मंदिर में मुख्य रूप से मदिरा का ही प्रसाद चढ़ता है. मंदिर के पुजारी भक्तों के द्वारा चढ़ाए गए प्रसाद को एक तश्तरी में उड़ेल कर भगवान के मुख से लगा देते हैं और देखते -देखते ही भक्तों की आंखों के सामने घटता है वो चमत्कार जिसे देखकर भी यकीन करना एक बार को मुश्किल हो जाता है. क्योंकि मदिरा से भरी हुई तश्तरी पलभर में खाली हो जाती है|

 

इसके अलावा जब भी किसी भक्त को मुकदमे में विजय हासिल होती है तो बाबा के दरबार में आकर मावे के लड्डू का प्रसाद चढ़ाते हैं तो वहीं जिन भक्तों की सूनी गोद भर जाती है वो यहां बाबा को बेसन के लड्डू और चूरमे का भोग लगाते हैं. प्रसाद चाहे कोई भी क्यों न हो बाबा के दरबार में आने वाले हर भक्त सवाली होता है और बाबा काल भैरव अपने आशीर्वाद से उसके कष्टों को हरने वाले देवता|

 

बाबा काल भैरव के इस धाम एक और बड़ी दिलचस्प चीज है जो भक्तों का ध्यान बरबस अपनी ओर खींचती है और वो है मंदिर परिसर में मौजूद ये दीपस्तंभ. श्रद्धालुओं द्वारा दीपस्तंभ की इन दीपमालिकाओं को प्रज्जवलित करने से सभी मनोकामनाऐं पूरी होती हैं. भक्तों द्वारा शीघ्र विवाह के लिए भी दीपस्तंभ का पूजन किया जाता है. जिनकी भी मनोकामना पूरी होती है वे दीपस्तंभ के दीप जरूर रोशन करवाते हैं. इसके अलावा मंदिर के अंदर भक्त अपनी मनोकामना के अनुसार दीये जलाते हैं जहां एक तरफ शत्रु बाधा से मुक्ति व अच्छे स्वास्थ्य के लिए सरसों के तेल का दीया जलाने की पंरपरा है तो वहीं अपने मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि की इच्छा करने वाले चमेली के तेल का दीया जलाते हैं.|

 

कालभैरव के इस मंदिर में दिन में दो बार आरती होती है एक सुबह साढ़े आठ बजे आरती की जाती है. दूसरी आरती रात में साढ़े आठ बजे की जाती है. महाकाल की नगरी होने से भगवान काल भैरव को उज्जैन नगर का सेनापति भी कहा जाता है. कालभैरव के शत्रु नाश मनोकामना को लेकर कहा जाता है कि यहां मराठा काल में महादजी सिंधिया ने युद्ध में विजय के लिए भगवान को अपनी पगड़ी अर्पित की थी. पानीपत के युद्ध में मराठों की पराजय के बाद तत्कालीन शासक महादजी सिंधिया ने राज्य की पुर्नस्थापना के लिए भगवान के सामने पगड़ी रख दी थी. उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि युद्ध में विजयी होने के बाद वे मंदिर का जीर्णोद्धार करेंगे. कालभैरव की कृपा से महादजी सिंधिया युद्धों में विजय हासिल करते चले गए. इसके बाद उन्होंने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया. तब से मराठा सरदारों की पगड़ी भगवान कालभैरव के शीश पर पहनाई जाती है|

 

बाबा काल भैरव के भक्तों के लिए उज्जैन का भैरो मंदिर किसी धाम से कम नहीं. सदियों पुराने इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसके दर्शन के बिना महाकाल की पूजा भी अधूरी मानी जाती है. अघोरी जहां अपने इष्टदेव की आराधना के लिए साल भर कालाष्टमी का इंतजार करते हैं वहीं आम भक्त भी इस दिन उनके आगे शीश नवां कर आशीर्वाद पाना नहीं भूलते| इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि अगर कोई उज्जैन आकर महाकाल के दर्शन करे और कालभैरव न आए तो उसे महाकाल के दर्शन का आधा लाभ ही मिलता है. धार्मिक मान्यता के मुताबिक, कालभैरव को ये वरदान है कि भगवान शिव की पूजा से पहले उनकी पूजा होगी|

 

इस मंदिर की कहानी बड़ी दिलचस्प है. स्कंद पुराण के मुताबिक चारों वेदों के रचियता ब्रह्मा ने जब पांचवें वेद की रचना करने का फैसला किया तो परेशान देवता उन्हें रोकने के लिए महादेव की शरण में गए. उनका मानना था कि सृष्टि के लिए पांचवे वेद की रचना ठीक नहीं है. लेकिन ब्रह्मा जी ने महादेव की भी बात नहीं मानी. कहते हैं इस बात पर शिव क्रोधित हो गए. गुस्से के कारण उनके तीसरे नेत्र से एक ज्वाला प्रकट हुई. इस ज्योति ने कालभैरव का रौद्ररूप धारण किया, और ब्रह्माजी के पांचवे सिर को धड़ से अलग कर दिया. कालभैरव ने ब्रह्माजी का घमंड तो दूर कर दिया लेकिन उन पर ब्रह्महत्या का दोष लग गया. इस दोष से मुक्ति पाने के लिए भैरव दर दर भटके लेकिन उन्हें मुक्ति नहीं मिली. फिर उन्होंने अपने आराध्य शिव की आराधना की. शिव ने उन्हें शिप्रा नदी में स्नान कर तपस्या करने को कहा. ऐसा करने पर कालभैरव को दोष से मुक्ति मिली और वो सदा के लिए उज्जैन में ही विराजमान हो गए.

 

कालभैरव भगवान की मूर्ति के सामने झूले में बटुक भैरव की मूर्ति भी विराजमान है । सभागृह के उत्तर दिशा की ओर पाताल भैरवी नाम की एक छोटी सी गुफा भी है । कालभैरव का मंदिर एक ऊँचे टीले पर बना हुआ है जिसके चारो ओर परकोटा बना हुआ है । उज्जैन में काल भैरव को शहर का रक्षक या कोतवाल मन जाता है ।

 

उज्जैन दर्शन

हरसिद्धि माता

५१ शक्तिपीठों में से एक माता हरसिद्धि का मंदिर महाकाल मंदिर से पश्चिम की ओर प्राचीन रूद्रसागर के पार ऊँचे स्थान पर स्थित है । हरसिद्धि माता मंदिर उज्जैन के देवी मंदिरों में शहर का एक महत्वपूर्ण मंदिर है।इस जगह का पुराणों में बहुत महत्व है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शिव सती के शरीर को ले जा रहे थे, तब उसकी कोहनी इस जगह पर गिरी थी।

 

माना जाता है कि माता हरसिद्धि सुबह गुजरात के हरसद गांव स्थित हरसिद्धि मंदिर जाती है तथा रात्रि विश्राम के लिए शाम को उज्जैन स्थित मंदिर आती है, इसलिए यहां संध्या आरती महत्त्व है ।तांत्रिक ग्रन्थ महाकाल- सहिंता(तृतीय खंड ) में इस मात्र -शक्ति को हरसिद्धि नाम से जाना जाता है |इस्कंद पुराण के अनुसार हरसिद्धि के मंदिर में महिष –बलि दी जाती थी| मंदिर के गर्भगृह में शिला पर श्रीयंत्र उत्कीर्ण है | हरसिद्धि देवी इसी श्रीयंत्र विग्रह क्र रुप में प्राण-प्रतिष्ठित है| माता अन्नपूर्णाके आसन के निचे सैट प्रतिमाओं में मध्य कलिका तथा पश्र्व्वार्तिनी महालक्ष्मी ओर महासरस्वती विराजितहै| माता हरसिद्धि की साधना से समस्त प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती है । इसलिए नवरात्रि में यहां गुप्त साधक साधना करने आते है।                                           

 

मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर भैरवजी की मूर्तियां है । गर्भगृह में तीन मूर्तियां है । सबसे ऊपर अन्नपूर्णा , मध्य में हरसिद्धि तथा नीचे माता कालका विराजित है । माँ को तत्कालीन सम्राट और न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य की आराध्य देवी कहा जाता है। किवदंती है कि यहाँ देवी को विक्रमादित्य द्वारा प्रसन्न करने के उद्देश्य से करीब 10 बार अपना शीश चढ़ाया गया है।

 

इस मंदिर का पुनर्निर्माण मराठों के शासनकाल में किया गया था, अतः मराठी कला की विशेषता दीपकों से सजे हुए दो खंभों पर दिखाई देती है।मंदिर परिसर में एक प्राचीन कुँआ है तथा मंदिर के शीर्ष पर एक सुंदर कलात्मक स्तंभ है। इस देवी को स्थानीय लोगों द्वारा बहुत शक्तिशाली माना जाता है।

 

 

 

उज्जैन दर्शन

गोपाल मंदिर

द्वारकाधीश गोपाल मंदिर उज्जैन नगर का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है।गोपाल मंदिर, उज्जैन के प्रसिद्ध स्थानों में से एक है तथा यह मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है। इस मंदिर को द्वारकाधीश मंदिर भी कहा जाता है। गोपाल मंदिर का निर्माण दौलत राव सिंधिया की धर्मपत्नी वायजा बाई ने संवत 1901 में कराया था जिसमें मूर्ति की स्थापना संवत 1909 में की गई। इस मान से ईस्वी सन 1844 में निर्माण 1852 में मूर्ति की स्थापना हुई।

 

मराठा वास्तुकला का सबसे बेहतरीन उदाहरण यह मंदिर कम से कम दो सौ वर्ष पूराना है जो काले ग्रेनेइड पत्थरों का एक बेहतरीन उदहारण है|।मंदिर का सफेद संगमरमर से निर्मित शिखर सुन्दर एवं दर्शनीय है| मंदिर में भगवान द्वारकाधीश, शंकर, पार्वतीऔर गरुढ़ भगवान की मूर्तियाँ है ये मूर्तियाँ अचल है और एक कोने में वायजा बाई की भी ‍मूर्ति है। यहाँ जन्माष्टमी के अलावा हरिहर का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हरिहर मिलन के समय भगवान महाकाल की सवारी रात बारह बजे धूमधाम  आती है तब यहाँ हरिहर मिलन अर्थात विष्णु और शिव का मिलन होता है। जहाँ पर उस वक्त डेढ़ दो घंटे पूजन चलता है।

 

यहाँ देवता की मूर्ति चांदी के रूप में लगभग 2 फीट की ऊँची है। इस मूर्ति को जहाँ रखा गया है वह एक संगमरमर से जड़ी हुई वेदी है और चांदी की परत वाले दरवाज़े हैं। चांदी की परत वाले दरवाज़े के बारे में एक मिथक है कि वे सोमनाथ मंदिर से महमूद गाज़ी द्वारा चुराए गए थे।ये एक अफग़ानी हमलावर महमूद षाह अब्दाली द्वारा लाहौर वापस लाए गए। एक लंबे संघर्ष के बाद, दरवाज़े बरामद किए गए और गोपाल मंदिर में पुनस्र्थापित किए गए। मंदिर परिसर में जन्माष्टमी सहित अनेक त्योहार सालभर मनाए जाते हैं।

 

मंदिर में दाखिल होते ही गहन शांति का अहससास होता है। इसके विशाल स्तंभ और सुंदर नक्काशी देखते ही बनती है। मंदिर के आसपास विशाल प्रांगण में सिंहस्त या अन्य पर्व के दौरान बाहर से आने वाले लोग विश्राम करते हैं। पर्वों के दौरान ट्रस्ट की तरफ से श्रद्धालुओं तथा तीर्थ यात्रियों के लिए कई तरह की सुविधाएँ प्रदान की जाती है। शहर के मध्य व्यस्ततम क्षेत्र में स्थित इस मंदिर की भव्यता आस-पास बेतरतीब तरीके से बने मकान और दुकानों के कारण दब-सी गई है।

 

 

उज्जैन दर्शन

गढ़कालिकाका

कालिदास की आराध्य देवी गढ़कालिका

उज्जैन की प्रतिष्ठा शक्तिपीठ के रुप में भी है |इस्कंद पुराण में यहाँ शक्ति के २४ इस्थान गिने गए है | शक्तिसंगम  तंत्र में गढ़कालिकाका उल्लेख है|

  गढ़कालिका क्षेत्र तांत्रिक और सिद्ध स्थान है । पुराणों के अनुसार जिस समय राम, रावण को मारकर अयोध्या वापस लौट रहे थे तो वे कुछ देर के लिए रुद्रसागर के पास रुके थे। उसी रात को कालिका भक्ष्य के रूप में निकली हुई थीं। उन्होंने हनुमान को पकड़ने का प्रयत्न भी किया पर हनुमान के भीषण रूप लेने पर देवी भयभीत हो गई। भागने के समय जो अंग गलित होकर गिर गया, वही स्थान यह कालिका देवी का है।

 

मंदिर के अंदर ही गणेशजी की प्राचीन पौराणिक प्रतिमा है, सामने ही पुरातन हनुमान मंदिर है। इससे लगी हुई विष्णु की एक भव्य चतुर्भुज प्रतिमा है जो अद्भुत और दर्शनीय है।क्षिप्रातट पर प्राचीन सिद्ध शमशान है। नाथ परंपरा की भर्तृहरि गुफा और मत्स्येन्द्र नाथ की समाधि भी इसी क्षेत्र में है।

 

महाकवि कालिदास के बारे में कौन नहीं जानता। महाकवि कालिदास उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य के नव रत्नों में से एक थे। बुद्धि कौशल तथा कविता रचना में उनकी प्रतिभा विलक्षण थी। कहते हैं बाल्यकाल में कालिदास एक सामान्य बालक की तरह ही थे। कालिदास अपनी आराध्य देवी की कृपा से ही महाकवि बने और सम्राट विक्रमादित्य के नव रत्नों में शामिल हुए। कालिदास की आराध्य देवी गढ़कालिका का मंदिर आज भी उज्जैन के भैरवगढ़ क्षेत्र में स्थापित है। इनकी आराधना से ही कालिदास सरस्वती पुत्र कहलाए। आज भी यहां विद्या प्राप्ति के इच्छुक सैकड़ों विद्यार्थी आराधना करने आते हैं। कहते हैं जो भी विद्यार्थी सच्चे मन से यहां प्रार्थना करता है मां उसका कल्याण अवश्य करती है।


जलते हैं दीपस्तंभ

मंदिर परिसर में अतिप्राचीन दीप स्तंभ भी हैं जो कि नवरात्रि के दौरान रोशन होते हैं। इनमें 108 दीप विद्यमान हैं। जो कि शक्ति का प्रतीक हैं। नौंवी सदी में इस मंदिर का जीर्णोद्धार हर्ष विक्रमादित्य ने करवाया था।


माता को चढ़ता है श्रृंगार

माता को श्रृंगार समग्री चढ़ाई जाती है। माता का स्वरूप काफी प्रसन्नतादायक है। भक्तों पर कृपा करते हुए माँ सदा मुस्कृराती हुई प्रतीत होती हैं। मूर्ति में चांदी के दांतों का भी आकर्षक प्रयोग किया गया है। माता की मूर्ति सिंदूरवर्णी है। जिसका प्रातः से ही स्नान, अभिषेक व श्रृंगार पंडितों द्वारा किया जाता है।

 

उज्जैन दर्शन

श्री छत्रेश्वरी चामुण्डा माता

श्री छत्रेश्वरी चामुण्डा माता का मंदिर शहर के मध्य चामुण्डा माता चौराहे पर स्थित है । यहाँ देवी छत्रेश्वरी तथा चामुण्डा दो रूप में विराजित है । इस मंदिर में माता पूर्व दिशा की ओर मुख करके विराजित है । इस मंदिर का जीर्णोद्धार १९७१ में हुआ था । शारदीय नवरात्रि की महाष्टमी पर दोपहर १२ बजे माता की शासकीय पूजा होती है । चैत्र नवरात्रि तथा अंग्रेजी नववर्ष की पहली तारीख पर मंदिर में माताजी को छप्पन भोग लगाया जाता है तथा फूलो व फलों से आकर्षक सज्जा की जाती है ।

 

छत्रेश्वरी चामुण्डा माता मंदिर में परिक्रमा पथ पर नवदुर्गा की मूर्तियां भी विराजित है । पृष्ठ भाग में हनुमानजी, महाभैरव तथा शिवजी का मंदिर भी है । भक्तो का कल्याण करने वाली माता चामुण्डा को मंगल करणी भी कहा गया है । इसलिए मंगलवार के दिन माताजी के दर्शन पूजन का विशेष महत्व है । मान्यता है कि लगातार १२ मंगलवार को माता के दर्शन करने से मनोकामना पूर्ण होती है ।

 

 

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भुखी माता

इस महादेवी की विक्रमादित्य से जुडी कथाये प्रचलित है

क्षिप्रा तट पर बना भुखी माता मंदिर विक्रमकालीन है । मुख्य रूप से मंदिर में दो देवियाँ विराजमान है दोनों ही माता आपस में बहने मानी जाती है । एक माता को भूखी माता व दूसरी को धूमावती माता के नाम से जाना जाता है । इस मंदिर को भुवनेश्वरी भूखी माता मंदिर भी कहा जाता है । मंदिर में आज भी पशु बलि देने की प्रथा है हालाँकि यहाँ आकर शाकाहारी भोजन अपने हाथ से बनाने और फिर माता को भोग लगाने पर देवी ज्यादा प्रसन्न होती है । नवरात्रि में अष्टमी को होने वाली नगर पूजा के दौरान मंदिर में मदिरा की धार लगाते हुए माता को मदिरा का भोग लगाया जाता है मंदिर परिसर में दो दीपस्तंभ स्थापित है । जिनपर नवरात्रि के दौरान दीप प्रज्वलित किये जाते है ।

 

इस मंदिर से राजा विक्रमादित्य के राजा बनने की किंवदंती जुड़ी हुई है। मान्यता है कि भूखी माता को प्रतिदिन एक युवक की बलि दी जाती थी। तब जवान लड़के को उज्जैन का राजा घोषित किया जाता था, उसके बाद भूखी माता उसे खा जाती थी। एक दुखी मां का विलाप देख नौजवान विक्रमादित्य ने उसे वचन दिया कि उसके बेटे की जगह वह नगर का राजा और भूखी माता का भोग बनेगा।

 

राजा बनते ही विक्रमादित्य ने पूरे शहर को सुगंधित भोजन से सजाने का आदेश दिया। जगह-जगह छप्पन भोज सजा दिए गए। भूखी माता की भूख विक्रमादित्य को अपना आहार बनाने से पहले ही खत्म हो गई और उन्होंने विक्रमादित्य को प्रजापालक चक्रवर्ती सम्राट होने का आशीर्वाद दिया। तब विक्रमादित्य ने उनके सम्मान में इस मंदिर का निर्माण करवाया।

 

यहां के पुजारी अमरसिंह के अनुसार कई माताओं में से एक नरबलि की शौकिन थी। राजा विक्रमादित्य ने इस समस्या के निदान के लिए देवी को वचन में लेकर नदी पार उनके मंदिर की स्थापना की। वचन में उन्होंने सभी देवी शक्तियों को भोजन के लिए आमंत्रित किया। कई तरह के पकवान और मिष्ठान बनाकर विक्रमादित्य ने एक भोजशाला में सजाकर रखवा दिए। तब एक तखत पर एक मेवा-मिष्ठान्न का मानव पुतला बनाकर लेटा दिया और खुद तखत के ‍नीचे छिप गए।

 

रात्रि में सभी देवियां उनके उस भोजन से खुश और तृप्त हो गईं। देवियां आपस में बातें करने लगीं कि यह राजा ऐसे ही हमें आमंत्रित करता रहा तो अच्छा रहेगा। जब सभी जाने लगीं तब एक देवी को जिज्ञासा हुई कि तखत पर कौन-सी चीज है जिसे छिपाकर रखा गया है।

 

अन्य देवियों ने कहा कि जाने दो, कुछ भी हो हमें क्या, हम तो तृप्त हो गए हैं चलते हैं, लेकिन वह देवी नहीं मानी और तखत पर रखे उस पुतले को तोड़कर खा लिया। खुश होकर देवी ने कहा- किसने रखा यह इतना स्वादिष्ट भोजन। तब विक्रमादित्य तखत के नीचे से निकलकर सामने आ गए और उन्होंने कहा कि मैंने रखा है।

 

देवी ने कहा कि- मांग लो वचन, क्या मांगना है। विक्रमादित्य ने कहा कि- माता से मैं यह वचन मांगता हूं कि कृपा करके आप नदी के उस पार ही विराजमान रहें, कभी नगर में न आएं। देवी ने राजा की चतुराई पर अचरज जाहिर किया और कहा कि ठीक है, तुम्हारे वचन का पालन होगा। सभी अन्य देवियों ने इस घटना पर उक्त देवी का नाम भूखी माता रख दिया।

 

 

उज्जैन दर्शन

भर्तृहरि की गुफा

त्याग ओर  तपस्या के लिए विश्व विख्यात राजा  भर्तृहरि 

नाथ भर्तृहरिराजा ,दार्शनिक,पंडित,कवी,ओर साधु,थे |वे राजा वीक्रमादित्य के अग्रज थे |उन्होंने राज्य त्याग कर इसी गुफा में भक्ति साधना की थी|  उज्जैन में भर्तृहरि की गुफा के संबंध में यह माना जाता है कि यहां भर्तृहरि ने तपस्या की थी। यह गुफा शहर से बाहर एक सुनसान इलाके में है। गुफा के पास ही शिप्रा नदी बह रही है। गुफा के अंदर जाने का रास्ता काफी छोटा है। जब हम इस गुफा के अंदर जाते हैं तो सांस लेने में भी कठिनाई महसूस होती है। गुफा की ऊंचाई भी काफी कम है, अत: अंदर जाते समय काफी सावधानी रखनी होती है। यहाँ पर एक गुफा और है जो कि पहली गुफा से छोटी है। यह गोपीचन्द कि गुफा है जो कि भर्तृहरि का भतीजा था।

 

              यहां की छत बड़े-बड़े पत्थरों के सहारे टिकी हुई है। गुफा के अंत में राजा भर्तृहरि की प्रतिमा है और उस प्रतिमा के पास ही एक और गुफा का रास्ता है। इस दूसरी गुफा के विषय में ऐसा माना जाता है कि यहां से चारों धामों का रास्ता है। गुफा में भर्तृहरि की प्रतिमा के सामने एक धुनी भी है, जिसकी राख हमेशा गर्म ही रहती है।

 

इसी गुफा में भरथरी ने 12 वर्षों तक तपस्या की थी।राजा भरथरी की कठोर तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए। इंद्र ने सोचा की भरथरी वरदान पाकर स्वर्ग पर आक्रमण करेंगे। यह सोचकर इंद्र ने भरथरी पर एक विशाल पत्थर गिरा दिया। तपस्या में बैठे भरथरी ने उस पत्थर को एक हाथ से रोक लिया और तपस्या में बैठे रहे। इसी प्रकार कई वर्षों तक तपस्या करने से उस पत्थर पर भरथरी के पंजे का निशान बन गया।

 

यह निशान आज भी भरथरी की गुफा में राजा की प्रतिमा के ऊपर वाले पत्थर पर दिखाई देता है। यह पंजे का निशान काफी बड़ा है, जिसे देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजा भरथरी की कद-काठी कितनी विशालकाय रही होगी। भरथरी ने वैराग्य पर वैराग्य शतक की रचना की, जो कि काफी प्रसिद्ध है। इसके साथ ही भरथरी ने श्रृंगार शतक और नीति शतक की भी रचना की। यह तीनों ही शतक आज भी उपलब्ध हैं और पढ़ने योग्य है।यहाँ वैशाख शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक भर्तृहरि उत्सव आयोजित होता है |  

 

उज्जैन दर्शन

बड़ा गणेश

श्री महाकाल के समीप रुद्रसागर के पूर्वी तट पर प्रसिद्ध ज्योतिर्विद पं. नारायण व्यास द्वारा इस्थापित

बड़ा गणेश मंदिर उज्जैन के सबसे ऐतिहासिक स्थलों में से एक है। यह मंदिर बुद्धि और समृद्धि के स्वामी भगवान गणेश को समर्पित है। यह मंदिर महाकाल मंदिर के समीप ही स्थित है । इस मंदिर में भगवान गणेश की एक विशाल अलंकृत मूर्ति है, इसी कारण इस मंदिर नाम बड़ा गणेश मंदिर रखा गया है।भगवान गणेश का मस्तक हाथी का है। जो भगवान गणेश के ज्ञान, विवेक और दूरदर्शिता का प्रतीक है ।

 

इस मंदिर के मध्य में पंचमुखी हनुमान की एक असाधारण एवं दर्शनीय मूर्ति निहित है। हनुमान जी का प्रत्येक मुख क्रमशः साहस, निष्ठा, भक्ति, शक्ति, और धर्म का प्रतीक है। हनुमान जी भक्ति व विश्वास का प्रतीक है। बड़े गणेशजी मंदिर आज भी ज्योतिष और संस्कृत भाषा पर शिक्षा प्रदान करने के लिए एक लोकप्रिय प्रशिक्षण केंद्र है। गणेश चतुर्थी के अवसर पर इस मंदिर में श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में भीड़ उमड़ती है ।