विदेशी प्रवासियों की दृष्टि में उज्जयिनी

LiveUjjainNews 22:21:16,17-Mar-2016 सिंहस्थ
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उज्जैन का उल्लेख पेरिप्लस में मिलता है। सेक्शन 48 में लिखा है-वारि-गाझा के पूर्व में एक नगर है, जिसे आझन कहते हैं। पुराने जमाने में यह राजधानी था। राजा निवास करता था। इस स्थान से बेरिगाझा को हर एक वस्तु मिल पाती है, जो स्थानीय लोगों के उपयोग में आ सके या भारत के अन्य भागों में निर्यात हो सके। इन वस्तुओं में चीनी मिट्टी के पात्र, मलमल, पीली झलकवाला तथा साधारण कपास आदि रहते थे। प्रोक्लाम से ऊपर के देशों में निर्यात करने के लिए सुगंधित मलहम, उबटन आदि लगाये जाते थे। इससे यह कह सकते हैं कि विक्रम के 150 वर्ष के बाद भी उज्जैन समृद्ध नगर था, यद्यपि राजा के न रहने के कारण उसका महत्व उतना नहीं रह पाया था। वह प्राचीन नगर आज अस्तित्व में नहीं है। उसके ध्वंसावशेष वर्तमान नगर से एक मील के अन्तर पर पाये जाते हैं। टॉलमी कहता है कि उसके मत से ओझेन रिस्टनेल की राजधानी थी। संभवत: यह रिस्टनेल चष्टन हो! यह चष्टन वही होना चाहिए, जिसके सिक्के मिलते हैं और पश्चिम भारत के गुफा मंदिरों के शिलालेखों पर उल्लेख है। यह राजा संभवत: पश्चिम भारत के क्षत्रप कुल का संस्थापक होना चाहिए। (इण्डियन एपिग्रा. III, पू. 171) 

ओझेन संस्कृत की उज्जयिनी, और वर्तमान उज्जैन 20.11 अक्षांश, 52 देशान्तर, प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के कारण विश्रुत है। महाकाल को कालप्रियनाथ भी कहा गया है। (केम्बेफ्लीट, एपिग्राफिका इंडिका, भाग 7)। भवभूति ने अपने नाटकों में कालप्रियनाथ नाम से जो चर्चा की है, वह यही है। यहाँ वासवदत्ता के पिता प्रद्योत की राजधानी थी। उसके बाद मौर्यों की राजधानी थी। पेरिप्लस ने लिखा है कि यह पहले की राजधानी की नगरी रही है। टॉलमी भी लिखता है कि यह चष्टन की राजधानी थी। चष्टन के वंशज शक-सत्रप (क्षत्रप) नाम से प्रसिद्ध हुए थे। हुएनत्सांग के समय उज्जैन कलचुरी लोगों की राजधानी थी। परमारों ने भी यहाँ प्रभुत्व किया, जो मुसलमानों तक जारी रहा (टॉलमी के एंशियण्ट इंडिया के अनुवाद से)।

हुएनत्सांग और फाहियान के समय में

हुएनत्सांग ने यू-शन-येन-ना अर्थात् उज्जैन की राजधानी का घेरा 30 ली अर्थात् 5 मील बतलाया है, जो प्रस्तुत सीमा से थोड़ा कम है। राज्यों का घेरा 6000 ली या 1000 मील था, जो पश्चिम की मालव सीमा तक रहा है। धार नगर यहाँ से 50 मील था। उज्जैन का इस समय तक अधिकार पश्चिम में चम्बल तक, उत्तर में इसकी सीमा मथुरा एवं जजहोती तक थी। पूर्व में महेश्वर, पुरा और दक्षिण में नर्मदा, ताप्ती नदी तक के मध्य का सतपुड़ा पहाड़ रहा है। इन सीमाओं के अंतर्गत अर्थात् पश्चिम में रणथम्भोर और बरदानपुर से पूर्व में दमोह और सिवनी तक उज्जैन राज्य की सीमा थी। (जूलियन का हुएनत्सांग 167, नक्शा नं. 1)। इसका घेरा 900 मील का था।

दो पड़ोसी राज्य जजहोती और महेश्वरपुरी के समान उज्जैन राज्य एक ब्राह्मण राजा के शासन के अंतर्गत था। जजहोती का राजा बौद्ध था। शेष दोनों राज्यों के शासक ब्राह्मण थे। पश्चिम मालवा का एक राजा बौद्ध था। किन्तु हुएनत्सांग का मो-ला-पी (मालवा) प्राचीन प्रदेश के अर्द्ध-पश्चिमी भाग तक ही सीमित था, जबकि पूर्वी अर्द्ध भाग का शासन ब्राह्मण के राज्याधीन था। चूँकि प्रांत का राजकीय विभाजन धार्मिक विभाजन से समता रखता है, इसलिए कनिंघम ने यह मतलब निकाला कि यह विभाजन धार्मिक मतभेदों के फलस्वरूप ही हुआ होगा और पश्चिमी या अर्द्धबौद्ध भाग (प्रांत) ने भी मालवे का प्राचीन नाम कायम रखा था। कनिंघम ने इस पर से यह निष्कर्ष निकाला है कि ब्राह्मण लोग ही पृथकतावादी थे। उज्जैन का राज्य मालवे के प्राचीन बौद्ध राज्य की एक ब्राह्मण निर्मित एक नवीन शाखा मात्र थी। इसी प्रकार महेश्वरपुर, कोशल या बरार के बौद्ध राज्य की एक ब्राह्मण शाखा मात्र थी। उज्जैन में कई दर्जन मठ थे। किन्तु हुएनत्सांग के समय केवल 3 मठ मौजूद थे, जिनमें लगभग 300 साधु रहते थे। देवों के अनेक मंदिर थे। राजा स्वयं ब्राह्मणों के शास्त्रीय ग्रंथों का पंडित था।

हुएनत्सांग ने जिस महेश्वरपुर का वर्णन किया है, उसका स्वरूप इस प्रकार था-

'चीनी यात्री जजहोती से 900 ली यानी 150 मील उत्तर में मी-ही-शी-फा-लो-पु-लो (महेश्वरपुर) की ओर चला जहाँ का राजा ब्राह्मण ही था। उत्तर दिशा चूंकि हम लोगों को कन्नौज के आसपास ले जाती है, अत: मैं (कनिंघम) इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि शायद पते में कुछ भूल रह जाती है। मेरा यह निश्चय है कि 900 ली ( 150 मील) दक्षिण दिशा की ओर समझा जाना चाहिए, जिस स्थान पर माण्डव का प्राचीन नगर स्थित है, जो कि महिष्मतिपुर भी कहलाता है। (एलोमन, जर्नल एशियाटिक सोसायटी, बंगाल 1837, पृ. 622)। ऊपरी नर्मदा प्रदेश की यह वास्तविक राजधानी थी, जो बाद में जबलपुर से 6 मील दूर त्रिपुरी (या तेवार) तक थी। महावंशों के अनुसार यह प्राचीन नाम है और भैंरो महादेव 240 ई.पू. में अशोक के समय महेशमाण्डव भेजा गया था (टर्नर का महावंशों पृ.71)। कहा जाता है कि इस देश की उपज उज्जैन के समान थी, जो एक सबूत है कि महेश्वर जजहोती से उत्तर नहीं हो सकता। गंगा-दुआब की हलके रंग की जमीन उज्जैन की काली मिट्टी से सर्वथा भिन्न है। इन कारणों से ऊपरी नर्मदा-तटवर्ती माहिष्मती को हुएनत्सांग के महेश्वरपुर से भिन्न नहीं समझा जाना चाहिए। राज्य का घेरा 3000 ली (500 मील) था। इस विस्तार के आधार पर इसकी सीमा पश्चिम में दमोह, लीओनी से लेकर पूर्व में नर्मदा की धारा तक निश्चित हो सकती है।'

-कनिंघम

हुएनत्सांग की दृष्टि और कनिंघम के निर्वाचन से स्पष्ट प्रतीत होता है कि मालवा एक ओर ताप्ती, नर्मदा से जुड़कर त्रिपुरी तक चला गया था और उधर मथुरा तक फैला हुआ था। संवत 462 विक्रमी में दूसरा चीनी यात्री फाहियान भी मालवे में आया था। उसने मालवे को मथुरा से दक्षिण में बतलाया है और उसे मज्झिम देश अर्थात् मध्यदेश कहा है। इसकी प्रकृति, आबादी, जन स्वभाव, शास्त्र-प्रणाली, नैतिकता, सच्चरित्रता आदि का संक्षिप्त किन्तु सुन्दर वर्णन किया है।

फाहियान की दृष्टि में मालवा

चीनी यात्री फाहियान मालवे में वि.सं. 462 के लगभग आया था। उसने मालवा का जो स्वरूप देखा, उसका कतिपय वर्णन इस प्रकार किया है- 'मथुरा के दक्षिण में मज्झिम देश मालवा है। यहाँ की सरदी-गरमी औसत दर्जे की है। यहाँ कड़ी ठंड या बर्फ नहीं पड़ती। यहाँ आबादी घनी होने पर भी खुशहाली है। उनको न तो अपने घरवालों का नाम ही सरकारी रजिस्टर में दर्ज करवाना पड़ता है, न कानून-कायदे के लिए हाकिमों के पास हाजिर होना पड़ता है। केवल वे ही लोग, जो सरकारी जमीन पर काश्त करते हैं, उसकी उपज का हिस्सा सरकार को देते हैं। लोग इधर-उधर जाने-आने या कहीं बसने के लिए स्वाधीन हैं। राज्य में प्राण-दण्ड या शारीरिक-दण्ड नहीं दिया जाता। अपराधियों पर उनके अपराध की गुरुता या लघुता के अनुसार जुर्माना किया जाता है। बार-बार बगावत करने पर भी अपराधियों का केवल दाहिना हाथ काट दिया जाता है। राजा के शरीर-रक्षकों या सेवकों को वेतन मिलता है। सारे देश में न कोई जीव हिंसा करता है, न शराब पीता है, न लहसुन या प्याज ही खाता है। हाँ, चाण्डालों में यह नियम नहीं है। चाण्डाल शब्द सबसे दूर रहने वाली जाति के लिए प्रयुक्त किया जाता हे। इस जाति के लोग जब नगर के द्वार या बाजार में निकलते हैं, तब अपने हाथ की लकड़ी से पृथ्वी पर खटखट कर देते हैं, इससे उनके आने का पता लग जाता है। इस प्रदेश के लोग न तो सुअर पालते हैं, न मुर्गे ही। जिन्दा मवेशी भी नहीं बेचते हैं। यहाँ के बाजारों में कसाइयों तथा शराब बेचने वालों की दुकानें नहीं हैं। सामान लेने-देने में कोड़ियों का उपयोग होता है। यहाँ केवल चाण्डाल ही मछली मारते हैं, शिकार करते हैं, मांस बेचते हैं।

' बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने के बाद अर्भक प्रदेशों के राजाओं ने और मुख्य धनिकों ने भिक्षुओं के लिए बिहार बनवाकर उनके साथ खेत, भवन, उद्यान बनवा दिये हैं। उनके लिए दिये दानों का विवरण धातु के दानपात्रों पर खुदा देने के कारण राजा लोग वंश परम्परा से उनका पालन करते चले आते हैं। कोई बाधा नहीं दे सकता। यही कारण है कि ये व्यवहार अब तक चले आ रहे हैं।'

'उत्तम कार्य करना, अपने धर्मग्रंथों का पाठ करना, ध्यान पूजा करना ही भिक्षुओं का कर्त्तव्य है। जब कभी कोई नवीन भिक्षु मठ में आता है, तब वहाँ के पुराने भिक्षु वस्त्र, पैर धोने के लिए पानी, मालिश के लिए तेल और तरल भोजन, जो कि नियमानुसार भोजन के समय के अतिरिक्त भी प्राप्त होता है, देकर उसका आदर-सत्कार करते हैं।'

'जिस स्थान पर बहुत से भिक्षु रहते हैं, वहाँ पर सारिपुत्र, महा मौग्याल्यान, आनंद, अभिधर्म, विनय और सूत्रों की स्मृति में स्तूप बनवाये हैं।'

' एक मास के वार्षिक अवकाश के बाद भक्त लोग एक-दूसरे को प्रोत्साहित कर भिक्षुओं के लिए तरल भोजन, जो हर समय लिया जा सकता है, भेजते हैं। तमाम भिक्षुवर्ग जुड़कर बुद्ध प्रदर्शित उपदेश सुनाते हैं। फिर पुष्प-अर्ध के द्वारा सारिपुत्र के स्तूप की पूजा करते हैं। रात को दीप जलाये जाते हैं। कुशल संगीतज्ञों के गायन का कार्यक्रम होता है। सारिपुत्र पहले ब्राह्मण था। बुद्ध के निकट जाकर भिक्षुव्रत लिया था। मौग्याल्यान और कश्यप ने भी धर्मान्तर किया था। भिक्षुणियाँ प्राय: अन्न देने के स्तूप पर जाकर ही भेंट-पूजा चढ़ाती हैं, क्योंकि सर्वप्रथम उसी ने बुद्ध से निवेदन कर स्त्रियों को संघ में लेने की प्रार्थना की थी। श्रमणेर लोग प्राय: राहुल के स्तूपों की पूजा करते हैं। अभिधर्म और विनय के आचार्य भी अपने-अपने स्तूपों पर पूजा करते हैं। हर साल एक बार इस प्रकार का उत्सव किया जाता है।'

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