अवन्ती क्षेत्र के प्राचीन अभिलेख और इतिहास चयन

LiveUjjainNews 22:17:13,17-Mar-2016 सिंहस्थ
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अवन्ती क्षेत्र का महत्व धार्मिक ही नहीं अपितु ऐतिहासिक दृष्टि से भी समस्त भारतवर्ष में विख्यात है। प्राचीन काल में मालव-प्रदेश दो भाग में विभक्त था; इसका पूर्वी भाग आकर के नाम से प्रसिद्ध था, जिसकी राजधानी विदिशा थी और पश्चिमी-मालव अवन्ती कहलाता था, जिसका प्रमुख केन्द्र उज्जैन (उज्जयिनी) था। पश्चिमी क्षत्रप वंश के पराक्रमी नरेश रुद्रदामन् के गिरनार (सौराष्ट्र) में मिले शिलालेख में 'पूर्वापरा-करावन्ती' यह प्रयोग आया है।

इस क्षेत्र की सीमा पश्चिम में चर्मण्वती (चम्बल), पूर्व एरिकेण (एरण, सागर जिला), दक्षिण में विन्ध्याचल की श्रेणियाँ तथा उत्तर में पूर्व-वाहिनी चम्बल, इस प्रकार निर्धारित की गई है। जैसा कि इस दोहे में स्पष्ट है:-

इत चम्बल उत बेतवा, मालव होय सुजान।

दक्षिण दिसि है नर्मदा, यह पूरी पहचान॥

स्थूल दृष्टि से मालवा का पठार और नर्मदा नदी के उत्तर का विस्तृत धरातल इस क्षेत्र के अन्तर्गत माना जाता है।

ईसा की तीसरी-चौथी शताब्दियों में इस क्षेत्र पर पश्चिमी शक-क्षत्रप वंश का आधिपत्य था। इस वंश की राजधानी उज्जयिनी थी। इस वंश के चार उप-वंश हुए हैं, जो इतिहास में क्षहरात, कार्दमक, स्वामी जीवनदामन् और द्वितीय रुद्रदामन् द्वारा प्रवर्तित वंश-इन नामों से अभिहित किए जाते हैं। इस वंश का एक भी अभिलेख इस भूभाग में उपलब्ध नहीं हुआ, यद्यपि उज्जैन से लगभग 115 किलोमीटर वायव्य में आवरा नामक प्राचीन स्थल (मंदसौर जिला) के उत्खनन में क्षत्रपकालीन मृद भाण्ड प्राप्त हुए हैं, जो इस सारे क्षेत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। (मध्यप्रदेश इतिहास परिषद् पत्रिका 4 पृ.31)

अनंतर काल में इस भू-भाग पर पाटलिपुत्र के गुप्त वंश का प्रभुत्व स्थापित हुआ। वस्तुत: गुप्तों के अभ्युदय के पूर्व इस धरातल के इतिहास को आलोकित करने वाली समुचित सामग्री का अभाव ही है। क्षत्रप वंश का समुच्छेद गुप्त-वंश के नरेश चंद्रगुप्त द्वितीय ने किया था और उस वंश को समूल नष्ट करने के कारण ही उसे 'शकारि' विरुद से अभिहित किया जाता है। इसी नरेश ने विक्रमादित्य की उपाधि भी धारण की थी। कथा-सरित्सागर और काव्य-मीमांसा (कथा-सरित्-सागर, 7,4-9 काव्य मीमांसा, पृ.55) में चन्द्रगुप्त को उज्जयिनी का राजा कहा गया है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि संभवत: पूर्वी मालवा की विजय कर लेने के पश्चात उसने उज्जैन को अपनी पश्चिमी राजधानी बनाने का गौरव प्राप्त किया, यद्यपि उसकी अन्य राजधानियाँ पाटलिपुत्र और अयोध्या भी थीं।

चन्द्रगुप्त द्वितीय का आधिपत्य-क्षेत्र कहां तक विस्तृत था यह निश्चित रूप से अज्ञात है, फिर भी इतना अवश्य जाना गया है कि उज्जैन का उत्तर-पश्चिम भूभाग दशपुर तक उस की सीमा में था। दशपुर के प्राचीन स्थल पर एक शिलालेख उपलब्ध हुआ है, जिसमें जयवर्मन् के पौत्र और सिंहवर्मन् के पुन नरवर्मन् का नाम आया है। यह अभिलेख मालव संवत् 461 अर्थात् 404 ईस्वी का है, जिसके अनुसार नरवर्मन् चन्द्रगुप्त का समकालीन माना गया है। इस लेख में नरवर्मन् के लिए 'सिंह विक्रांत गामिन्' यह विशेषण प्रयुक्त है और इसके आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि उसने चन्द्रगुप्त का आधिपत्य स्वीकार कर लिया था, जिसके सिक्कों से ज्ञात 'सिंह विक्रम' विरुद भी है। यद्यपि यह मत अनिश्चित ही है। इस और इसी प्रकार के अन्य आधारों पर चन्द्रगुप्त द्वितीय को ही उज्जयिनी का विक्रमादित्य सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाता है। यद्यपि यह मत विवादास्पद है।

इसी स्थल पर चन्द्रगुप्त द्वितीय के पुत्र कुमारगुप्त प्रथम के समय का एक शिलालेख उपलब्ध हुआ है। सुन्दर संस्कृत के विभिन्न 54 श्लोकों में रची हुई यह एक प्रशस्ति है और इसका कवि वत्स भट्टि था, अत: यह उसके नाम से विख्यात है। पश्चिमोत्तर मालव की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति के निरूपण की दृष्टि से यह प्रशस्ति महत्वपूर्ण है। उसमें उल्लिखित है कि जब कुमारगुप्त पृथ्वी पर शासन कर रहा था,उसका एक राज्यपाल, विश्ववर्मन् यहाँ अवस्थित था। वह शुक्र और वृहस्पति के समान बुद्धिमान और पृथ्वी के राजाओं का आभूषण तथा पार्थ (अर्जुन) के समान शक्तिशाली था। वह दीनानुकम्पी था; आर्त और दुखियों पर दया करता था; दयालु तथा मित्रों के लिए कल्पवृक्ष था। वहाँ बसने वालों को यह अभय देता था और भयभीतों का परित्राण करता था। विश्ववर्मन् का पुत्र बन्धुवर्मन् गंभीर, नीतिमान् तथा लोकप्रिय था।

लेख से यह आभास होता है कि बन्धुवर्मन् की स्थिति कुमारगुप्त के समान अथवा एक अधीन शासक के सदृश थी। आन्तरिक मामलों में वह पूर्णत: स्वतंत्र था।

इस लेख में आगे कहा गया है कि दशपुर भू-भाग में व्याप्त शांति और समृद्धि से आकृष्ट होकर, लाटदेश (गुजरात) के तन्तुवायों (बुनकरों) की एक श्रेणी दशपुर में आई जिसे नृपति बन्धुवर्मन् का संरक्षण प्राप्त हुआ था। उस बुनकर श्रेणी ने निजी आय से दशपुर में एक भव्य एवं अदभुत सूर्य मंदिर का मालव संवत 493 (ई. 436) में निर्माण किया और कालान्तर में इस मंदिर का एक भाग ध्वस्त हो जाने पर उसी श्रेणी ने उसका जीर्णोद्धार भी मालव संवत् 529 (ई. 473) में किया।

उक्त अभिलेख ऐतिहासिक दृष्टि से ही नहीं, अपितु भाषा, साहित्य, रचना सौष्ठव और उन्नत विचार-सरणि की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। अत: उसमें आया हुआ केवल दशपुर वर्णन यहाँ मूल श्लोकों में देने की प्रवृत्ति का सँवरण हम नहीं कर पाते। वे श्लोक इस प्रकार हैं :-

ते देश-पार्थिव-गुणापद्धता: प्रकाश-

मध्वादिजान्यविरलान्यसुखान्यपास्य।

जातादरा दशपुरं प्रथमं मनोभि-

रन्चागता: ससुखबन्धुजनास्समेत्य ॥5॥

 

मत्तेभ-गण्ड-तट-विच्युत-दान-बिन्दु-

सिकोपलाचल सहस्त्र-विभूषणाया:।

पुष्पावनम्र-तरु-मण्ड-वतंसकाया

भूमै: परं तिलक-भूतमिदं क्रमेण ॥6॥

 

तदोत्थ-वृक्ष-च्युत-नैक-पुष्प-विचित्र-तीरान्त-जलानि भान्ति।

प्रफुल्ल-पद्माभरणानि यत्र सरांसि कारण्डव-संकुलानि ॥7॥

विलोल-वीची-चलितारविन्द-पतद्रज:पिंजरितंश्च हंसै:।

स्व-केसरोदार-भरावभुग्कै: क्वचित्सरांस्यम्बुरुहैश्च भान्ति ॥8॥

स्व-पुष्प-भारावनर्तर्नगेर्न्द्रर्मद-प्रगल्भालि-कुल-स्वनैश्च।

अजस्त्रगाभिश्च पुरांगनाभिर्वनानि यस्मिन् समलंकृतानि ॥9॥

चलत्पताकान्यबला-सनाथान्यत्यर्थशुक्लान्यधिकोन्नतानि।

तडिल्लता-चित्र सिताभ्र-कूट-तुल्योपमानानि गृहाणि यत्र ॥10॥

 

कलास-तुंग-शिखर-प्रतिमानि चान्या-

न्याभान्ति दीर्घ-वलभीनि नि सेवेदिकानि ।

गान्धर्व-शब्द मुखराणि निविष्ट-चित्र ।

कर्माणि लोल-कुदली-वन-शोभितानि 11॥

 

प्रासाद-मालाभिरलंकृतानि धरौं विदार्यैव समुत्थितानि।

विमान-माला-सदृशानि यत्र गृहाणि पूर्णेन्दु-करामलानि ॥12॥

 

यद् भात्यभिरम्य-सरिद्-द्वयेन चपलोर्मिणा समुपगूढम।

रहसि कुच-शालिनीर्भ्यां प्रीति-रतिर्म्यास्मरांगमिव ॥13॥

 

सत्य-क्षमा-दम-शम-वृत्त-शौच-धैर्य-

स्वाध्याय-वृत्त-विनय-स्थिति-बुद्धु युपेर्त:॥

विद्या-तपो-निधिमिरस्मयिततैश्च विप्रैर्-

यद्राजते ग्रहगणै: खमिव प्रदीपै: ॥14॥

अथ समेत्य निरन्त-सड्ग-तैरहरह: प्रविजृम्भित-सांहृदा: ।

नृ पतिभिस्सुतवत् प्रतिभानिता: प्रमुदिता न्यवसन्त सुखं पुरे ॥15॥

 

श्रवणग्सुभगधानुवैधं दृढं परिनिष्ठिता:

सुचरित-श्तासडगा: केचिद्विचित्र-कथाविद: ।

विनय-निभृतासयम्यग्धर्म्म-प्रसंग-परायणा:

प्रियमपूरूषं पतथ्यं चान्ये क्षमा बहु भाषितुम् ॥16॥

केचित् स्व-कर्म्मण्यधिकास्तथान्यैर्विज्ञायते ज्योतिषमात्भवद्भि: ।

अद्यापि चान्ये समर-प्रगल्भा: कुर्वन्त्यरीणामहितं प्रसह्य ॥17॥

 

प्राज्ञामनोज्ञ-वधव: प्रथितोरूर्वशा

र्वशानुरूप-चरिताभरणास्तथान्ये।

सत्यव्रता: प्रणयिनाभुपकार-दक्षा

विस्त्रम्भ-पूर्वमपरे दृढसौहदाश्च ॥18॥

विजित-विजय-सडगंर्धर्म्मशीलैस्तथान्यै-

र्मुदुभिरधिक-सत्वैर्लोक-यात्रामदैक्ष।

स्व-कुल-तिलक-भूतैर्युक्तरागैरदौरे

रधिकमभिविभाति श्रेणिरेवं-प्रकारं ॥19॥

(यहाँ ये श्लोक उद्धृत करते समय शिला पर उत्कीर्ण अक्षरों की अशुद्धियों और तकनीकी बारीकियों पर ध्यान नहीं दिया गया है।)

संक्षिप्त स्वतंत्रानुवाद

दशपुर-नरेश की ख्याति से आकृष्ट होकर लाट देश के बुनकरों की एक श्रेणी अपने स्वजनों के साथ इस नगर में आकर बस गई थी। यह नगर वस्तुत: मदमत्त गज-समूह से शोभित पर्वतमालाओं तथा पुष्पाच्छादित तरुमण्डलों से पृथ्वी के तिलक के समान है। इसमें कहीं विकच कमलों के पराग से कर्बुरित, कारण्डवों से संकुल सरोवर हैं, कहीं पुष्पित तरुमालाओं के बीच सरिताएँ प्रवाहित होती हैं, और कहीं मदप्रगल्भ अलिगण के गंजार और पुष्पभार से पहाड़ियाँ झुकी-सी दिखाई देती हैं। कहीं वनों में पुरांगनाएँ विहार करती हैं। वातान्दोलित पताकाओं तथा आती-जाती रमणियों से सुशोभित जिसके उन्नत एवं सुधाधवलित घर बिजली की चमक से युक्त मेघ-समूह से नजर आते हैं। उनमें कहीं संगीत का आयोजन होता है, कहीं चित्रशाला है, और कहीं कदली-वृक्ष की झाँकियाँ बनी हैं। अनेक कक्षों से अलंकृत, विमान माला के समान ऊँचे तथा चन्द्रकिरणों के सदृश अमल ये घर मानों भूतल को चीरकर ऊपर उठ आए हों। दो जलधाराओं से घिरे हुए इस नगर के निवासी शम,दम और पवित्रता से संयुक्त, विद्वान, अध्ययनरत होकर अपने कर्म में प्रवृत्त रहते हैं। वे पराक्रमी भी हैं। उनका पारस्परिक सोहार्द दर्शनीय है। यहाँ का राजा उन्हें पुत्रवत् मानता है।

इस प्रशस्ति के एक श्लोक का तात्पर्य आज तक विद्वानों में विवादास्पद बना है -श्लोक यह है:-

बहुना समतीतेन कालनान्यैश्च पार्थिवै: ।

व्यशीर्यतैक देशोस्य भवनस्य ततोधुना ।।

 

स्वयशोवृद्धये सव्वंमत्युदारमुदारया ।

संस्कारित भिदेभूय: श्रेण्या भानुमतो गृहम् ॥

 

बहुत समय व्यतीत हो जाने के पश्चात् समय और अन्य नरेशों के समय में (अथवा द्वारा) इस मंदिर का एक भाग टूट जाने (अथवा तोड़ा जाने ) के कारण मंदिर का पुनर्निर्माण उसी श्रेणी ने किया।

प्रथम श्लोक में आए हुए 'व्यशीर्यत' इस पद के अर्थ की संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से बहुत खींचातानी हुई है। इसके दोनों अर्थ होते हैं- 'टूट गया' और 'तोड़ा गया'। 'तोड़ा गया' इस अर्थ को 'अन्यै: पार्थिवै:' (दूसरे राजाओं द्वारा) के साथ लेकर कुछ विद्वान इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यहाँ हूणो का निर्देश है, जो मंदिरों को ध्वस्त करने में प्रसिद्ध थे। यह मत सर्वमान्य नहीं है। कुछ भी हो यह निर्विवाद है कि कुमारगुप्त के अंतिम दिनों में (लगभग 456-57 ईस्वी) उत्तर से आए बर्बर हूणों ने मंदसौर की पार्श्व-भूमि को आकम्पित कर दिया था, और कुमारगुप्त के पुत्र स्कन्दगुप्त ने उन पर पूर्ण विजय प्राप्त की थी। ईसा की पाँचवीं सदी के अंतिम चरण और छठी सदी के प्रारंभ में इस भू-भाग पर हूणों के निरंतर उपद्रव होते रहे। विष्णुवर्धन यशोधर्मन् नामक नरेश ने उन्हें अंतिम रूप से खदेड़ा जिसके दो प्रस्तराभिलेख मंदसौर में उपलब्ध हुए हैं। मालव (विक्रम) संवत 589 (523 ईस्वी) में उत्कीर्ण एक लेख में यशोधर्मन् को 'राजाधिराज परमेश्वर' इस उपाधि से अलंकृत किया है और इसमें उसके मंत्री धर्मदाष के के अनुज दक्ष द्वारा कूप-निर्माण का उल्लेख है। इस मंत्री का वंश वृक्ष भी अभिलेख में दिया है।

दूसरा लेख दो पाषण-स्तम्भों पर गुप्तलिपि में उत्कीर्ण है, जिनमें एक-दूसरे की प्रतिकृति है। ये दोनों स्तम्भ मंदसौर से लगभग सात किलोमीटर दूर सौंधनी नामक ग्राम के पास उपलब्ध हुए हैं। लेख में कुल 9 श्लोक हैं, जिनमें केवल अंतिम अनुष्टुभ् और शेष आठ संस्कृत में शिखरिणी वृत्त में हैं।

इस अभिलेख के मूल श्लोक यहाँ उदघृत किए जाते हैं:-

वेपन्ते यस्य भीम-स्तनित-भय-समुद्भ्रान्त-दैत्य दिगन्ता:

रटंगाघातै: सुमेरोव्विघटित-दृषद: कन्दरा य: करोति।

उक्षाणं तं दधान: क्षितिधर-तनया-दत्त-पंचाडगुलाडकं

द्राघिष्ठ: शूलपाणे: क्षपयतु भवतां शत्रुतेजांसि केतु: ॥1॥

आविर्भूतावलेपनैरविनय-पटुभिर्ल्लडिघ ताचार-मार्ग्रे्-

म्मोहादैदं-युगीनैरपशुभ-रति भि: पीडयमाना नरेन्द्रै:।

यस्य क्षमा शार्ग्डपाणेरिव कठिन-धनुर्ज्या-किणाड़क-प्रकोष्ठं

बाहुं लोकोपरकार-वत-सफल-परिस्पन्द-धीरं प्रपन्ना ॥2॥

निन्द्याचारेषु योडस्मिन्विनयमुर्षि युगे कल्पना-मात्र-वृत्या

राजस्वन्येषु पांसुष्विव कुसुम-बलिर्नावभासे प्रयुक्त:।

स श्रेयोधाम्नि सम्राडिति मनु-भरतालर्क्क-मान्धातृ-कल्पे

कल्याणे हेम्नि भास्यान्मणिरिव सुतरां राजते यत्र शब्द:॥3॥

ये भुक्ता गुप्त-नाथैर्न्न सकल-वसुधाक्क्रान्ति-दृष्ट-प्रतापैर्-

नाज्ञा हूणाधिप नां क्षितिपति-मुकुटाध्यासिनी यान्प्रविष्टा।

देशास्तान्धन्व-शैल-द्रुम-गहन-सरिद्वीर-बाहूपगूढान्

वीर्यावस्कन्न-राज्ञ: स्व-गृह-परिसरावज्ञया यो भुनक्ति॥4॥

आलौहित्योपकण्ठात्तल-वन-गहनोपत्यकादा महेन्द्रा-

दा गंगाशिलष्ट-सानोस्तुहिनशिखरिण: पश्चिमादा पयोधे:।

सामन्तैर्यस्य बाहु-द्रविण-हृत-मदै: पादयोरानमदि्भश्-

चूडा-रत्नांशु-राजि-व्यतिकर-शबला भूमि-भागा: क्रियन्ते॥5॥

स्थाणोरन्यत्र येन प्रणति-कृपणतां प्रापितं नोत्तमाड्ग

यस्याशिलष्टो भुजाभ्यां वहति हितगिरिर्द्दर्ग-शब्दाभिमानम्।

नीचैस्तेनापि यस्य प्रणति-भुज-बालावर्जिज्जत-क्लिष्ट-मूर्घ्ना

चूडापुष्पोपहारैम्मिहिरकुल-नृपेणार्चिच्चतं पाद-युग्मेम् ॥6॥

गामेवोन्मातुमूर्द्ध विगणयितुमिव ज्योतिषां चक्क्रवालं

निर्देष्टुं मार्ग्गमुच्चैद्दिव इव सुकृतोपार्ज्जिताया: स्व-कीर्त्ते:।

तेनाकल्पान्त-कालावधिरवनिभुजा श्री-यशोधर्म्मणायं

स्तंभ: स्तंभाभिराम-स्थिर-भुज-परिघेणोच्छ्रिर्ति नायितोत्र ॥7॥

श्लोध्ये जन्मास्य वंशे चरितमघहरं दृश्यते कानतमस्मिन्

धर्म्मस्यायं निकेतश्चलति नियमितं नामुना लोकवृत्तम्।

इत्युत्कर्ष गुणानां लिखितुमिव यशोधर्म्मणश्चन्द्र-बिम्बे

रागादुक्षिप्त उच्चैर्भुज इव रूचिमान्य: पृथिव्यां विभाति ॥8॥

इति तुष्टूषया तस्य नृपते: पुण्य-कर्म्मण:।

वासुलेनोपरचिता: श्लोका: कक्कस्य सूनुना ॥9॥

उत्कीर्ण्णा गोविन्देन॥

यह एक प्रशस्ति है, जिसमें तत्कालीन परिस्थिति-निदर्शनपूर्वक यशोधर्मन् का पराक्रम अंकित किया है। सभी श्लोक शुद्ध, उन्नत, संस्कृत, गौडी रीति में है। प्रथम श्लोक में यह बताया है कि श्रेय-भाजन, मनु, भरत, अलर्क और मान्धाता के समतुल्य, सुवर्ण-कंकण में मणि के समान शोभित, शाडर्गपाणि (विष्णु) के समान यशोधर्मा ने उन नरेशों को परास्त किया जो मदमस्त, विनय से शून्य और सच्चे मार्ग से च्युत हो गए थे और जिनके अत्याचारों से पृथ्वी पीड़ित हो गई थी। चौथे श्लोक में यह कहा है कि यशोधर्मन् उतने भू-भाग पर अधिपत्य करता था, जितना न तो गुप्त नरेशों के अधीन था और न हूणों के। पाँचवें श्लोक की वर्ण्य वस्तु यशोधर्मन् की सीमा है, जो लौहित्य (ब्रह्मपुत्र), हिमालय, पश्चिम समुद्र से दक्षिण के महेन्द्र पर्वत तक विस्तृत थी। छठे श्लोक में कहा गया है कि वह शिव का भक्त था और उससे पादपद्म मिहिर कुल (हूण नरेश) ने भी अर्चित किए थे। सातवाँ श्लोक कवि कल्पना का सुन्दर उदाहरण है। उसमें यह उत्प्रेक्षा है कि यशोधर्मन् ने यह स्तम्भ खड़ा किया, इसका उद्देश्य मानो पृथ्वी को नापना था या आकाश के तारे गिनना अथवा अपनी कीर्ति को स्वर्ग का मार्ग बतलाना था। आठवें श्लोक में फिर स्तम्भ का ललित भाषा में वर्णन है। उसमें कहा गया है कि श्लाघ्य वंश में जन्में इस राजा के गुण और पराक्रम को चन्द्रबिम्ब में अंकित करने की दृष्टि से यह स्तंभ खड़ा किया। अंतिम श्लोक में बतलाया है कि यह रचना कक्क के पुत्र वासुल ने की थी। समाप्ति में उत्कीर्णकार गोविन्द का नाम दिया है।

काल-मान से इसके बाद का लेख उसी जिले में भानपुरा से लगभग 5 कि.मी. इन्द्रगण नामक प्राचीन स्थल पर उपलब्ध हुआ है। इस लेख का संपादन लेखक ने बिहार रिसर्च सोसाइटी की पत्रिका भाग x<।, पृ. 1-13 में किया है। विक्रम संवत् 767 (ई. 710) के इस लेख की 19 पंक्तियों में 15 संस्कृत भाषा के श्लोक के साथ अंतिम चार पंक्तियाँ गद्य में हैं। भाषा सुन्दर और काव्यमय है। प्रथम तीन श्लोकों में शिव-वन्दना, चौथे श्लोक में राष्ट्रकूट वंश के नन्नप्प नरेश का उल्लेख और 5-8 श्लोकों में पाशुपताचार्य विनीत-राशि और उसके शिष्य दानराशि का नाम आता है। दानराशि ने इस स्थल पर एक विशाल शिव मंदिर का निर्माण किया था। 10-11 श्लोकों में मंदिर की अन्य जानकारी दी है और 12वें श्लोक में इसके दीर्घ काल तक स्थिर रहने की कामना की है। श्लोक 13-14 में समय का उल्लेख है और श्लोक 15 में यह बतलाया है कि इस प्रशस्ति की रचना गौड़ देश से आए दुर्गादित्य ने की थी और चामुण्डराज ने इसे उत्कीर्ण किया। इसके बाद गद्य भाग में मंदिर की भूमि की सीमा के साथ कतिपय दान-कर्ताओं का उल्लेख है।

धार्मिक दृष्टि से जिस महत्वपूर्ण निष्कर्ष का संकेत हमें मिलता है वह यही है कि इस स्थल के पार्श्ववर्ती भू-भाग में उस समय शैव मत का प्राबल्य था और उसके अनुयायी विद्वान् आचार्यों का यहाँ निवास था। इसके आसपास के क्षेत्र में उपलब्ध हुई लकुलीश शिव की प्रतिमाओं से इस मत की पुष्टि होती है।

इस क्षेत्र में पाशुपत मत का प्राबल्य कम से कम 5-6 शताब्दियों तक रहा। इस स्थल के पास ही मोड़ी नामक ग्राम में मिले एक खंडित शिलालेख से सिद्ध होता है। इस लेख में अनन्तरकालीन परमार नरेश जयवर्मन् द्वितीय के समय में मोड़ी में वि.स. 1314 (ई.1252) में इसी मत के एक आचार्य द्वारा मंदिर निर्माण का उल्लेख है। इस लेख के चार में से केवल दो टुकड़े उपलब्ध हुए हैं, जो इन्दौर संग्रहालय में सुरक्षित है। इस समय से लगभग चार सौ बरसों तक अवन्ती-क्षेत्र में कोई प्राचीन अभिलेख उपलब्ध नहीं हुआ। यह वही समय था जब दक्षिण के राष्ट्रकूटों का कन्नौज के गुर्जर-प्रतीहारों से संघर्ष जारी था, जिसके कारण उज्जैन के आसपास का समस्त भू-भाग प्रभावित हो गया था। इस निरन्तर लम्बे संघर्ष के फलस्वरूप ये दोनों प्रबल शक्तियाँ धीरे-धीरे क्षीण हो गई और इनके अधीनस्थ शासक अपना सिर ऊंचा उठाने लगे। यही स्थानीय शासक परमार-नरेशों का उदय-काल है। इस वंश के पराक्रमी नरेश वाक्पति-मुंज के चार ताम्र-लेख इस क्षेत्र में पाए गए हैं। उनका विवरण इस प्रकार है :-

 
प्राप्ति स्थल
वि. संवत
ईस्वी सन्
1.
धरमपुरी (जिला धार)
1031
974 'उज्जयिनी सभावासिते'
2.
उज्जैन
1036
980 'महा विजय स्तंभ धारे' 'भगवत्पुरावासिते'
3.
गोनरी (उज्जैन जिला)
1038
982 'हूणमंडले'
4.
गोनरी (उज्जैन जिला)
1053
986, अवन्ती मंडले उज्जयिनी विषये'
मालव-क्षेत्र के कुछ भाग को जीतने वाला सर्व-प्रथम परमार नरेश वाक्पति मुज्ज का पित सीयक था, जिसके दो दान-पत्र गुजरात के अहमदाबाद जिले में मिले हैं। इनका समय ई. 949 और 969 है। इन सभी ताम्रपत्रों के तुलनात्मक अध्ययन से संभावित निष्कर्ष यही है कि उज्जैन के आसपास का भूभाग या तो सीयक के अंतिम दिनों में अथवा मुंज के प्रारंभिक दिनों में परमार-वंश के अधिकार में गया।

ऊपर बतलाए हुए तीनों स्थलों में परवर्ती स्थल उसके पहले के स्थल के पूर्व में है, इससे मुंज के पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ने का अनुमान लगाया जाना आसान है। इन ताम्रपत्रों के तुलनात्मक अध्ययन से कुछ और तथ्य प्रकट होते हैं। धरमपुरी में मिला अभिलेख उज्जैन से वितरित किया गया था और उसमें निर्दिष्ट 'शिवतडाग' जहां मुंज ने स्नान किया था, महाकाल के प्रांगण का कुण्ड होना संभव है। उज्जैन में उपलब्ध ताम्रपट्ट का दान 'भट्टेश्वरी देवी' की पूजा-साहित्य जुटाने और उसके मंदिर की टूट-फूट की दुरूस्ती के हेतु किया गया है। यह देवी उज्जैन की गढ़कालिका या हरसिद्धि होना संभव है। गोनरी (1) में हूण मंडल में दान देने का भी ताम्रपत्र में उल्लैख है, जिससे अनुमान है कि मुंज उस समय हूणों से रण में जूझ रहा था जो मंदसौर जिले के आसपास उस समय तक स्थायी रूप से बस गए थे। स्कंदगुप्त द्वारा हूणों के पराभव का उल्लैख ऊपर आया है। गोनरी (2) में जो भौगोलिक वर्णन किया है उससे यह ज्ञात होता है कि उस समय मंडल, विषय और भुक्ति ये शासकीय नाम थे (territorial divisions)

मुंज का भतीजा इतिहास प्रसिद्ध भोजदेव है। जिसके बारे में एक उल्लेख है कि उसने इतने ताम्रपत्र दान किए जिनके कारण तांबा महँगा हो गया और शत्रुओं के पांवों में सांकलें डालने के कारण लोहा। अवन्ती क्षेत्र में उसके ताम्रपत्र इन स्थानों पर मिले हैं :- महुडी (सीहोर जिला) सं. 1074, बेटमा (धार जिला) सं. 1076, उज्जेन 1078, देपालपुर (इन्दौर जिला) 1079। धार की भोजशाला की सरस्वती मूर्ति (जो आजकल ब्रिटिश म्यूजियम लंदन में प्रदर्शित है) इसी के समय की है। यह भोज की आराध्य-देवी थीं। विस्तार भय से इन अभिलेखों का विवरण इस लेख में देना संभव नहीं है।

भोज के अनुज और उसके अनुवर्ती परमार उदयादित्य के दो अभिलेख इस क्षेत्र में उपलब्ध हुए हैं। इनमें एक लेख, जो आज धार ही में है, पार्वती की सुन्दर प्रतिमा के पादपीठ पर वि.सं. 1038 (ई. 981) में उत्कीर्ण किया गया था, और दूसरा कमेद नामक गांव में मिला है जो उज्जैन से 8 कि.मी. दूर है। इसका संवत् विक्रम 1040 (ई. 983) है।

उज्जैन का एक शिलालेख अपनी विशेषता के कारण सारे भारतवर्ष में अद्वितीय है। यह लेख महाकाल-मंदिर के प्रवेश द्वार के बाईं ओर एक छोटी मंदरी की भांति से जड़ा है। इसका तकनीकी नाम 'वर्ण-नाग-कृपाणिका' है - अर्थात् छुरी केसमान फण वाला साँप, जिस पर अक्षर उत्कीर्ण किए हैं। स्लेट रंग की यह शिला 35 से.मि. चौड़ी और 44 से.मी. ऊंची है। लेख की कुल 28 पंक्तियाँ है। पहली 17 पंक्तियों में शार्दल-विक्रीड़ित छन्द में संस्कृत के 6 सुन्दर शिव-स्तुति के श्लोक दिए हैं। जिनमें से बहुतों के अंत में 'ज्योति: सतां शाम्भवम्' यह दिया है। उसके बाद 5 पंक्तियों में देवनागरी अक्षर और पाणिनीय सूत्र (अइउण् आदि), और अंतिम 6 पंक्तियों में उदयादित्य की प्रशंसा के साथ अंत में कवि का नाम दिया है। नागरी-वर्णों की जमावट एक साँप की गेंडुरियों में की गई है और उसकी पूँछ पर संस्कृत के धातु-प्रत्यय उकेरे गए हैं। साँप का फण छुरी या कटार के आकार का है।

इसी प्रकार के लेख ऊन (निमाड़ जिला) और धार में भी जिले हैं। धार के लेखों का संपादन धार के दिवंगत के.के. लेले ने और तदन्तर इन सब का संपादन श्री शास्त्री ने एपिग्रफिया इंडिका, भाग 31 पृ. 29 पर किया है। शास्त्री ने यह भी कल्पना की है कि जब इसके पहले श्लोक के अनन्तर क्रमांक 79 है तब यह निर्विवाद है कि इसके पहले के 1-78 श्लोक किसी अन्य प्रस्तर पर उत्कीर्ण हों। मंदिर के ऊपरी भाग पर 2-3 छोटे-छोटे पाषाण-खंड हैं, जो संभवत: इसी के अंश हों, यद्यपि यह निश्चित रूप से कहने में हम असमर्थ हैं। शास्त्री का यह भी अनुमान है कि इस लेख के पूर्व भाग में परमार वंश का वर्णन हो सकता है। स्थानाभाव के कारण हम यहाँ इस लेख का केवल एक श्लोक उदधृत करते हैं, जो कवि-कल्पना एवं दर्शनशास्त्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण है:-

क्रीड़ा-कुण्डलितोरगेश्वरतनूकाराधिरू ढाम्बरानुस्वारं

कलयन्नकाररूचिराकार: कृपार्द्र: प्रभु:।

विष्णोर्विश्वतनोरवन्ति-नगरी-हृत्पुण्डरीके वसन्

ओंकाराक्षरमूर्तिरस्यतु महाकालोन्तकालं सताम्॥

इस श्लोक के पूर्वार्ध में 'अकार' का स्वरूप बतलाया है, जो क्रीड़ा से कुण्डलित शेष नाग सरीखा होकर आकाश तक पहुंच गया है। उत्तरार्ध में 'ओ' का स्वरूप बतलाकर उसका महाकाल से साम्य प्रदर्शित किया है और अन्त में आशीर्वाद में यही कहा है कि अवन्ति नगरी के हृदय-रूपी कमल में निवास करने वाला वह महाकाल सज्जनों के अन्तकाल को दूर करे।

इस श्लोक में यह भी कहा है कि विश्वव्यापी विष्णु ही महाकाल है यह कथन शिव और विष्णु का ऐक्य स्थापित करता हुआ, 'शिवस्य हृदयं विष्णु-र्विष्णोश्च हृदयं शिव:'-अर्थात् शिव और विष्णु एक ही है - इस उक्ति का स्मरण कराता है।

अवन्ती-क्षेत्र में कुछ ही वर्ष पूर्व मिले एक ताम्रपत्र का संक्षिप्त उल्लेख करना हम आवश्यक समझते हैं, जिसकी प्राप्ति की कथा रोचक है। यह ताम्रपत्र पूरे अभिलेख का पहला पत्रा है, जिसका दूसरा पत्रा अनुपलब्ध है। देवास के एक तमेरे ने इसमें से दो गोल टुकड़े काटे; उसका विचार उन्हें किसी छोटी बालटी के पेंदे में लगाने का था। बचेखुचे टुकड़े बेच दिए जो उज्जैन के पास ही की एक फैक्टरी में गलने के लिए गए। मेरे दिवंगत मित्र डॉ. नागू अथक परिश्रम से इन सबको समेटकर मेरे पास लाए और उन सबको ढालकर पूरा ताम्रपत्र पहले जैसा बनाया गया। उस लेख से उदयादित्य की अंतिम तिथि (1093 ईस्वी-पूर्व) ज्ञात हुई जो इतिहासों में नई बात ही है। ताम्रपत्र आज तक दिल्ली के संग्रहालय में सुरक्षित है।

उज्जैन में ही उपलब्ध हुए तीन ताम्रपत्रों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करके हम इस लेख को समाप्त करते हैं। ये तीनों ताम्रपत्र उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में कर्नल (बाद में मेजर) टाड ने खोजे थे। इनमें से प्रत्येक का लेख दो पत्रों में पूर्ण होता है, किन्तु आश्चर्य है कि प्रत्येक का केवल एक ही पत्रा मिल सका। फिर भी ये सब तत्कालीन मालव के इतिहास के निर्माण में सहायक होते हैं। इनका प्राप्ति का विवरण इस प्रकार है:-

 
राजा का नाम
पहला या दूसरा पत्रा
वि. संवत्
ईस्वी सन्
1.
यशोवर्मन् (परमार नरवर्मन् का पुत्र)
दूसरा
1192
1135
2.
जयवर्मन् (यशोवर्मन् का पुत्र)
पहला
तिथि रहित
 
3.
लक्ष्मीवर्मन् (जयवर्मन् का भाई)
दूसरा
1191 और 1200
1135 और 1144
प्राप्तिकर्ता ने ये तीनों ताम्रपत्र ग्रेट ब्रिटेन की रॉयल एंशियाटिक सोसायटी को प्रदान कर दिए जहाँ ये आजकल सुरक्षित हैं। इन तीनों का संपादन कीलहार्न ने इंडियन एटिक्वेरी भाग 19 पृष्ठ 345 पर किया है।

अपनी अपूर्णावस्था में भी ये तीनों ताम्रपत्र ईसा की बारहवीं सदी के मध्यकाल का परमार-इतिहास जानने के अनन्य साधन हैं। राजाभोज (1100-1150 ई.) के अंतिम समय में मालव-भूमि पर चारों ओर से शत्रुओं के आक्रमण प्रारंभ हो गए थे और भोज के भाई और उत्तराधिकारी उदयादित्य के पुत्र नरवर्मन के राज्यकाल में इन आक्रान्ताओं ने सारी मालव-भूमि को झकझोर डाला था। नरवर्मन् के पुत्र और उत्तराधिकारी यशोवर्मन् के प्रारंभिक वर्षों में ही सन् 1138 में गुजरात नरेश चालुक्य जयसिंह ने मालव का विस्तृत भाग अपने अधिकार में कर लिया और उसके दोनों पुत्र, जयवर्मन् और लक्ष्मीवर्मन् अपने राज्य में ही इधर से उधर भागते रहे। वे जयसिंह के अधिकार में न थे, जैसा कि इन ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है। इसी समय के आसपास मालव पर उनकी पूर्वीय सीमा पर स्थित चन्देल नरेशों के आक्रमण भी होते हैं। मालव सीमा में ही भिन्न-भिन्न भागों से ये तीनों ताम्रपत्र प्रदान करने का उल्लेख है। इनमें से अंतिम ताम्रपत्र में दो तिथियों के साथ यह भी उल्लेख है कि पहली तिथि (1135 ई.) में दिए हुए दो गाँव लक्ष्मीवर्मन ने सन् 1144 में फिर से दिए। इससे हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इन दोनों ग्रामों के आसपास की भूमि गुजरात के राजा जयसिंह ने अपने अधिकार में कर ली थी।

इस प्रकार अनेक ऐसे तथ्य वंशावलि के साथ इन ताम्रपत्रों के आधार पर प्राप्त होते हैं जिनसे तत्कालीन मालव के शासन पर प्रकाश पड़ता है। इन सब तथ्यों को लेकर इतिहासज्ञों में मतभेद भी है जिसका विवेचन विस्तार भय से यहां करना असंभव है।

चौलुक्यों का अधिकार इस भूमि पर लगभग चालीस वर्ष रहा जिसका विवेचन यहाँ करना अनावश्यक ही है।

ये तीनों ताम्रपत्र उज्जैन-क्षेत्र में मिली अंतिम ऐतिहासिक उपलब्धियाँ हैं।

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