चिंतामन गणेश

LiveUjjainNews 11:53:03,05-Mar-2016 उज्जैन दर्शन
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चिंतामन गणेश मंदिर उज्जैन के तीर्थ स्थलों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है । उज्जैन से करीब 6 किलोमीटर दूर हे |

चिंतामन गणेश मंदिर में भगवान श्री गणेश के तीन रूप एक साथ विराजमान है, जो चितांमण गणेश, इच्छामण गणेश और सिद्धिविनायक के रूप में जाने जाते है। श्री चिंताहरण गणेश जी की ऐसी अद्भूत और अलोकिक प्रतिमा देश में शायद ही कहीं होगी। चिंतामणी गणेश चिंताओं को  दूर करते हैं, इच्छामणी गणेश इच्छाओं को पूर्ण करते हैं और सिद्धिविनायक रिद्धि-सिद्धि देते हैं। इसी वजह से दूर-दूर से भक्त यहां खिंचे चले आते हैं।

 

स्वयं-भू स्थली के नाम से विख्यात चिंतामण गणपति की स्थापना के बारे में कई कहानियां प्रचलित है। ऐसा माना जाता है कि राजा दशरथ के उज्जैन में पिण्डदान के दौरान भगवान श्री रामचन्द्र जी ने यहां आकर पूजा अर्चना की थी। सतयुग में राम, लक्ष्मण और सीता मां वनवास पर थे तब वे घूमते-घूमते यहां पर आये तब सीता मां को बहुत प्यास लगी । लक्ष्मण जी ने अपने तीर इस स्थान पर मारा जिससे पृथ्वी में से पानी निकला और यहां एक बावडी बन गई। माता सीता ने इसी जल से अपना उपवास खोला था। तभी भगवान राम ने चिंतामण, लक्ष्मण ने इच्छामण एवं सिद्धिविनायक की पूजा अर्चना की थी।

 

मंदिर के सामने ही आज भी वह बावडी मोजूद है। जहां पर दर्शनार्थी दर्शन करते है। इस मंदिर का वर्तमान स्वरूप महारानी अहिल्याबाई द्वारा करीब 250 वर्ष पूर्व बनाया गया था। इससे भी पूर्व परमार काल में भी इस मंदिर का जिर्णोद्धार हो चुका है। यह मंदिर जिन खंबों पर टिका हुआ है वह परमार कालीन हैं।

 

देश के कोने-कोने से भक्त यहां दर्शन करने आते है।

 

उज्जैन के मालवा क्षेत्र में सैंकडो वर्षों से परम्परा चली आ रही कि जो भी कोई शादी करता है तो उसके परिजन लग्न यहां लिखवाने आते है और शादी के बाद पति-पत्नी दोनों ही यहां आकर दर्शन करते है और वो लग्न यहां चिंतामण जी के चरणों में छोड़कर जाते है। दोनों पति-पत्नी चिंतामण गणेश जी प्रार्थना करते है कि हमारी सारी चिंताओं को दूर कर हमे सुखी जीवन प्रदान करना।

किसी भी धार्मिक आयोजन, शुभकार्य, विवाह इत्यादि का प्रथम निमंत्रण भगवान चिंतामन गणेश को ही दिया जाता है ।



चैत्रमास की जत्रा 

प्रथम पूज्य गणेश भगवान केा धन्यवाद देने के लिए इस पावन पर्व का आयोजन किया जाता है। जत्रा की शुरुआत चैत्र मास के बुधवार से हेाती हैं । जो इस महीने के प्रति बुधवार को मनाया जाता है । आसपास के ग्रामीण इलाकों के किसान मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। अब जत्रा की इस परंपरा में अब किसानेां के साथ साथ आम लोग भी इसमें शामिल हेा गए हैं।

 

जत्रा के समय चिंतामण के अलावा अन्य गणेश मंदिरों में जत्रा की धूम रहती है। गजानन भगवान का इस दिन विशेष श्रृंगार किया जाता है। मंदिर का प्रांगण की सजावट बहुत ही आकर्षित हेाती है । दुकाने सजी हुई व लोगों का जत्रा केा लेकर बहुत उत्साहित नजर आते हैं । चारों ओर लोगों की चहल पहल दिखाई पड़ती है।

 

इस उत्सव के दौरान भगवान केा विशेष भोग भी लगाया जाता है। लोग मंदिरों में अपनी मान्याता पूरी हेाने पर क्विटलों से भोग लगाते हैं। इसमें लोंगो द्वारा दान पुण्य भी किया जाता है। चैत्र माह के आखिरी बुधवार को इसका समापन हेा जाता है।

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